🌿 आहुरुवत: कथा का शुभारंभ
जब हवाओं में पुराने समय की गंध घुल जाए, जब दीवारें तुम्हें अपने भीतर खींचने लगें — तब समझ लेना, कोई पुरानी कहानी तुम्हारे नाम लिखी जा रही है।
यह हवेली — दो मंज़िला, जर्जर, फिर भी ज़िंदा — तुम्हें बुला रही है।
क्योंकि हर ईंट में कोई राज़ सो रहा है, हर झरोखा तुम्हें देख रहा है।
यहाँ हर दरार एक दरवाज़ा है, और हर परछाईं — एक गीत।
कहते हैं, इस हवेली में अनामिका की परछाईं अब भी साँस लेती है।
कहते हैं, यहाँ दादाजी की अधूरी कहानियाँ अब भी दीवारों से रिसती हैं।
और कहते हैं… अगर तुमने एक बार इसकी दहलीज़ पर क़दम रखा,
तो लौटना नामुमकिन है।
तो आओ — इस यात्रा की शुरुआत करो।
एक बार जब दरवाज़ा खुलता है, तब हवेली का हर शब्द तुम्हारी साँस बन जाएगा।
अब तुम्हारा रास्ता, तुम्हारी हवेली, और तुम्हारी कहानी — सब एक हो जाएँगे।
– Lucifer Singh
अध्याय 1: हवेली के दरवाज़े
बाहर की धूप में एक अजीब सी थकान घुली हुई थी—ऐसी थकान जो जिस्म से ज़्यादा रूह को महसूस हो रही थी, ठंडी और उदास। सूरज आसमान पर तो था, मगर उसकी तपिश में वो जीवनदायिनी ऊर्जा नहीं, बल्कि एक बोझिल कर देने वाली शुष्कता थी। पुराने, जटाधारी बरगद के झूलते झुरमुटों से जब हवा टकराकर गुज़रती, तो उसमें पत्तों की सरसराहट के साथ एक भीनी-भीनी सीलन की गंध घुल जाती, जैसे बरसों पुराना कोई दबा हुआ राग हो, जिसे किसी ने छेड़ा न हो, पर उसकी उपस्थिति हर सांस में महसूस हो। हवा में तैरती वह गंध अतीत की किसी भूली-बिसरी याद की तरह थी, जो अनचाहे ही मन के किसी कोने में दस्तक दे जाती थी।
सफर लंबा और थका देने वाला था। कार की खिड़की पर धूल की एक महीन, भूरी परत जम गई थी, जैसे किसी अदृश्य कलाकार ने कैनवास पर हल्का सा रंग फेर दिया हो। विवेक अपनी उँगलियों से उस धूल पर बेतरतीब, आड़ी-तिरछी लकीरें बना रहा था—कभी सीधी, कभी गोल, कभी आपस में उलझती हुई। हर लकीर जैसे उसके मन में चल रही अनकही उलझनों का प्रतिबिंब थी, मानो वह उन रेखाओं में कोई खोई हुई कहानी, कोई भूला हुआ चेहरा तलाश रहा हो। उसका मन भारी था, एक अनजाने बोझ से दबा हुआ, जिसे वह नाम नहीं दे पा रहा था।
सामने लंबी, सपाट सड़क थी—निपट सुनसान, जैसे अनंत में विलीन हो रही हो। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में भी एक अजीब सी वीरानी थी। माँ की आँखें चुपचाप सड़क पर टिकी थीं, स्थिर, भावशून्य। मगर उनकी पलकों की हर झपक में जाने कौन-सा अनकहा सपना, कौन सी अधूरी प्रार्थना पल रही थी। उनका चेहरा शांत था, पर उस शांति के पीछे एक गहरा समंदर छिपा था, जिसमें अतीत की लहरें उठ रही थीं। विवेक कई बार माँ को देख चुका था – उनकी खामोशी में अक्सर ऐसी बातें छिपी होती थीं जिन्हें वो कभी जुबान पर नहीं लाती थीं।
पिता स्टीयरिंग व्हील पर हाथ रखे हुए थे, उनकी उँगलियाँ कभी-कभी सीट की गद्दी पर थिरक उठती थीं, जैसे कोई अनकहा, अनसुना गीत उनके भीतर बज रहा हो—कोई पुरानी धुन, कोई अधूरा संगीत। उनके चेहरे पर तनाव की महीन लकीरें थीं, जिन्हें वे छिपाने की कोशिश कर रहे थे, पर वे विवेक की नज़रों से छिपी नहीं थीं। कभी-कभी वे एक गहरी सांस लेते, जैसे किसी भारी ज़िम्मेदारी का एहसास उन्हें दबा रहा हो।
आखिरकार, एक लंबे इंतज़ार के बाद, कार एक विशाल, काले लोहे के फाटक के पास आकर रुकी। फाटक इतना ऊँचा और भारी-भरकम था कि उसे देखकर ही एक अजब सी सिहरन दौड़ जाती। दीमकों की एक विशिष्ट, तीखी गंध उसमें ऐसी बसी थी जैसे समय खुद ही गलकर उसका हिस्सा बन गया हो—यह समय का एक ठहरा हुआ, सड़ता हुआ अंश था। जंग ने लोहे पर अपने निशान बना दिए थे, जो किसी पुराने ज़ख्म की तरह दिख रहे थे।
“यही है?” विवेक ने धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए स्वर में पूछा। उसकी आवाज़ में हल्की हिचक थी, एक अनजाना सा डर और ढेर सारी जिज्ञासा। वह जानता था कि वे यहाँ क्यों आए हैं, पर इस जगह को अपनी आँखों से देखना एक अलग ही अनुभव था।
माँ ने कुछ नहीं कहा, बस एक गहरी, थकी हुई साँस ली और बिना किसी की ओर देखे कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतर गईं। उनके हर mouvement में एक अजीब सी निष्क्रियता थी, जैसे वो किसी और ही दुनिया में हों। पिता ने कार बंद की और हाथ बढ़ाकर फाटक को धक्का दिया।
फाटक की चरमराहट—चूं…चूं…चूं…चूं…र्रर्र…—एक कर्कश, वेदना भरी ध्वनि हवा में घुल गई, जैसे किसी गहरी नींद में सोए हुए भूले-बिसरे युग ने अचानक करवट ली हो, या किसी बंदी आत्मा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हो। वह आवाज़ विवेक के कानों से होती हुई सीधे उसके दिल तक उतर गई, और वहाँ एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर गई।
फाटक के पार, थोड़ी दूरी पर, खड़ी थी वह हवेली—किसी तपस्वी की तरह दुनिया से कटी हुई, अपने ही अतीत के गहरे ध्यान में गुम। दो मंज़िला विशाल मकान, जिसकी दीवारों पर पीला, पपड़ीदार पलस्तर जगह-जगह से उखड़ा हुआ था, जैसे धूप ने नहीं, बल्कि किसी पुराने, विक्षिप्त चित्रकार ने अपनी तूलिका से उदासी के रंग चढ़ाए हों। हर दरार, हर उखड़ी हुई पपड़ी, जैसे हवेली की उम्र और उसके देखे हुए मौसमों की कहानी कह रही हो।
ऊपर की मंज़िल पर बनी बालकनियों में मकड़ियों ने अपने साम्राज्य स्थापित कर लिए थे, उनके जाले हवा में हल्के-हल्के झूल रहे थे, जैसे समय के महीन धागे हों। जंग लगी लोहे की कलात्मक जालियों में न जाने कितनी अनकही, अनसुनी कहानियाँ उलझी पड़ी थीं, जिन्हें पढ़ने वाला कोई नहीं था। खिड़कियों के शीशे या तो टूटे हुए थे या धूल से इतने अटे थे कि पार देखना मुश्किल था।
विवेक ने एक धीमा, लगभग अनमना सा कदम आगे बढ़ाया—उसकी आँखों में उत्सुकता थी, एक किशोरवय की सहज जिज्ञासा, पर साथ ही दिल की धड़कनें ऐसी तेज़ हो गई थीं जैसे किसी अदृश्य, विशाल नगाड़े की थाप पर अनियंत्रित होकर काँप रही हों। हर कदम के साथ उसके मन में सवालों का एक नया बवंडर उठता था।
हवेली के मुख्य दरवाज़े तक जाने वाले रास्ते पर सूखी पत्तियाँ बिखरी थीं और घास बेतरतीब उग आई थी। फर्श पर जमी धूल की मोटी परत में हर कदम की आवाज़ एक प्रतिध्वनि बनकर गूँज उठती—चर्र… चर्र… खस्स…। यह आवाज़ इतनी स्पष्ट थी कि लगता था हवेली की खामोशी उसे और बढ़ा रही है।
मुख्य दरवाज़े के ठीक ऊपर, दीवार पर टँगी थी एक बड़ी सी तस्वीर—दादाजी की। धूल की एक मोटी परत ने तस्वीर को почти ढँक लिया था, पर उनकी मुस्कान अब भी पहचानी जा सकती थी—एक फीकी, रहस्यमयी मुस्कान। और आँखें… वे आँखें ऐसी थीं जैसे अब भी सब कुछ देख रही हों, हर आने-जाने वाले को, हर रहस्य को, हर छुपी हुई बात को। उन आँखों में एक अजीब सी गहराई थी, जो विवेक को अपनी ओर खींच रही थी।
विवेक ने एक पल को उनकी आँखों में झाँका। उसे लगा जैसे दादाजी उसे कुछ कहना चाह रहे हों, कोई चेतावनी, कोई संदेश। एक सर्द लहर उसकी रीढ़ में दौड़ गई।
“ये हवेली… ये हवेली तो जैसे… साँस ले रही है,” उसने अपने आप से बुदबुदाया, आवाज़ इतनी धीमी कि शायद उसे खुद भी ठीक से सुनाई न दी हो। पर उसे वाकई ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे इन दीवारों में धड़कनें हों, जैसे यह सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि कोई जीवित चीज़ हो।
माँ, जो उसके पास ही खड़ी थीं, शायद कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील थीं या हवा ने विवेक के शब्द उन तक पहुँचा दिए थे। उन्होंने पलटकर पूछा, “क्या कहा तुमने, विवेक?” उनकी आवाज़ में थकान के साथ एक अनजाना सा डर भी था।
“कुछ नहीं, माँ… कुछ नहीं,” विवेक ने जल्दी से कहा, खुद को संभालते हुए। पर उसके दिल में किसी भूले हुए, अनजाने डर की दस्तक স্পষ্ট हो चुकी थी। एक ऐसा डर जिसका कोई नाम नहीं था, पर जिसकी मौजूदगी रोंगटे खड़े कर देने वाली थी।
वे अनिच्छा से मुख्य दरवाज़े से अंदर दाखिल हुए। हॉल में पुराना, भारी-भरकम फर्नीचर अपनी जगह पर जस का तस पड़ा था, जैसे किसी ने बरसों से उसे छुआ तक न हो। बड़ी-बड़ी, नक्काशीदार कुर्सियों से रूई के फाहे बाहर झाँक रहे थे, जैसे किसी अदृश्य, बेचैन प्राणी ने उन्हें चुपचाप, धीरे-धीरे नोच डाला हो। हर चीज़ पर धूल की मोटी चादर बिछी थी। हवा में एक अजीब सी गंध थी – पुरानी लकड़ी, सीलन, और कुछ और… कुछ ऐसा जिसे विवेक पहचान नहीं पा रहा था, पर जो अरुचिकर था।
दीवार के एक कोने में, उपेक्षित सी, मयूर के पंखों की डिज़ाइन वाली एक खूबसूरत वॉकिंग स्टिक पड़ी थी—किसी भूले हुए, अपदस्थ राजा की तरह, जो अपने गौरवशाली अतीत की याद दिला रही हो। दादाजी की पसंदीदा छड़ी।
माँ ने हॉल के चारों ओर एक सतर्क दृष्टि डाली और फिर धीमे, दबे हुए स्वर में कहा, “विवेक, यहाँ किसी भी चीज़ को मत छूना।” उनकी आवाज़ में एक अजीब सा डर था, जो सिर्फ विवेक के लिए नहीं, बल्कि शायद खुद के लिए भी था। वह डर इतना गहरा था कि हॉल की ऊँची दीवारों की दरारों में भी गूंजता हुआ सा महसूस होता था।
पिता बिना कुछ कहे, भारी कदमों से लकड़ी की चौड़ी सीढ़ियों की ओर बढ़े, जो ऊपर की मंज़िल की ओर जाती थीं। उनकी थापें शांत हॉल में धूल भरी गूँज पैदा कर रही थीं, हर कदम जैसे अतीत के किसी पन्ने को पलट रहा हो।
माँ ने अपना छोटा सा हैंडबैग एक पुराने, धूल सने सोफे पर रखा और बिना किसी हिचकिचाहट के रसोई की ओर बढ़ गईं, जैसे वहाँ कोई अधूरी, प्रतीक्षारत कथा उन्हें बरबस अपनी ओर बुला रही हो, या शायद वह उस हॉल की बोझिलता से बचना चाहती थीं।
कुछ देर खामोशी छाई रही, जिसे केवल बाहर हवा के झोंकों और कभी-कभी घर के किसी हिस्से से आने वाली चरमराने की आवाज़ ही तोड़ती थी।
“दादाजी को इस घर से, इस हवेली से बहुत ज़्यादा लगाव था,” माँ ने अचानक कहा, जब वह रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनकी पीठ अभी भी कमरे की ओर थी, पर उनकी आवाज़ हॉल की दीवारों से टकराकर लौट रही थी, और उसमें एक अजीब सी उदासी और जटिलता घुली हुई थी।
“अगर उन्हें इतना लगाव था, तो फिर हम लोग यहाँ पहले कभी क्यों नहीं आए?” विवेक ने धीमे, मासूम स्वर में पूछा। यह सवाल उसके मन में काफी देर से कौंध रहा था।
माँ एक पल को रुकीं, जैसे सही शब्द तलाश रही हों। फिर बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “क्योंकि विवेक… कुछ साल पहले… ये हवेली… अब ‘घर’ नहीं रही थी।” उनके शब्दों में जो दर्द और रहस्य छिपा था, उसने विवेक के मन में और भी सवाल खड़े कर दिए। ‘घर नहीं रही थी’ का क्या मतलब हो सकता था?
शाम होते-होते हवेली की दीवारें जैसे वाकई साँस लेने लगी थीं। अंधेरा होते ही पुरानी इमारत का चरित्र बदल गया। दिन के उजाले में जो चीज़ें सिर्फ़ पुरानी और उपेक्षित लग रही थीं, वे अब रहस्यमयी और भयावह लगने लगी थीं। परछाइयाँ लंबी और विकृत हो गईं, और हर छोटी-मोटी आवाज़ भी बड़ी और डरावनी लगने लगी।
विवेक ऊपर के एक कमरे में, जिसे शायद उसके लिए चुना गया था, खिड़की के पास बैठा था। खिड़की के बाहर हवेली की सूखी, उजाड़ बगिया थी, जिसमें फीकी, डरी-डरी सी चाँदनी पसरी हुई थी। पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ किसी कंकाल की उँगलियों की तरह आसमान की ओर उठी हुई थीं।
रात का खाना भी एक अजीब, बोझिल रस्म बन गया—खिचड़ी की सोंधी, सात्विक महक कमरे में फैली थी, पर हर निवाले के बीच एक ऐसा गहरा, अथाह सन्नाटा गूँज रहा था जो किसी चीख से भी ज़्यादा भयानक था। कोई कुछ बोल नहीं रहा था, बस चम्मचों की खनक कभी-कभी उस चुप्पी को तोड़ देती थी, और वह खनक भी अचानक बहुत भारी और कर्णभेदी लगने लगती थी।
आखिरकार विवेक से रहा नहीं गया। “दादाजी को… दादाजी को आखिर हुआ क्या था?” उसने सीधे माँ से पूछा, अपनी प्लेट में नज़रें गड़ाए हुए।
माँ के हाथ जो खिचड़ी मिला रहे थे, अचानक थम गए। चम्मच की खनक जो अब तक धीमी थी, अचानक एक झटके के साथ प्लेट से टकराई और वह ध्वनि उस खामोशी में बहुत भारी, बहुत भयावह लगने लगी।
“तुम… तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो, विवेक?” माँ की आँखें काँप रही थीं, और उनके चेहरे का रंग थोड़ा पीला पड़ गया था। उन्होंने विवेक की ओर सीधे नहीं देखा।
“क्योंकि लोग कहते हैं… आस-पड़ोस में, पुराने जानने वाले… वो कहते हैं कि दादाजी… वो पागल हो गए थे। अपने आखिरी दिनों में।” विवेक ने सपाट स्वर में कहा, पर उसकी आवाज़ में एक चुनौती भी थी, सच जानने की एक गहरी तड़प। “और अब हम उसी घर में हैं जहाँ यह सब हुआ। क्या… क्या तुम्हें डर नहीं लगता, माँ?”
माँ की आँखें उनकी थाली में रखे खाने पर झुक गईं, जैसे उनमें विवेक के सवालों का सामना करने की हिम्मत न हो। पिता ने धीरे से अपना गिलास नीचे रखा और धीमे, गंभीर स्वर में कहा, “विवेक, तुम्हारी माँ ने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा और सहा है। दादाजी के आख़िरी साल… वे हममें से किसी के लिए भी आसान नहीं थे…” उनकी आवाज़ में एक गहरी वेदना थी।
विवेक की साँसें जैसे किसी गहरे, अंधे कुएँ में उतरती चली गईं। उसके मन में उठ रहे सवाल और भी गहरे हो गए थे। ‘आसान नहीं थे’ – इन शब्दों में कितनी कहानियाँ, कितना दर्द छिपा था, यह वह सोच भी नहीं पा रहा था।
देर रात को वो अपने बिस्तर पर लेटा। छत पर लगा पुराना पंखा बहुत धीमे-धीमे, एक अजीब सी लय में घूम रहा था, और उसकी हरकतों से ‘घर्र-घर्र’ की आवाज़ आ रही थी, जैसे हर चक्कर में वह कोई भूली हुई, उदास लोरी गा रहा हो, या शायद कोई चेतावनी दे रहा हो।
फिर—टप। एक खामोशी। टप। टप। पानी की बूँदों के टपकने जैसी आवाज़। या शायद कुछ और? दरवाज़े के बाहर, गलियारे में, किसी के नंगे पाँवों की धीमी, रहस्यमयी थाप। बहुत हल्की, पर विवेक के सतर्क कानों ने उसे पकड़ लिया।
उसने हड़बड़ाकर करवट बदली। अँधेरे में उसकी आँखें फैली हुई थीं, पुतलियाँ चौड़ी हो गईं। “कुत्ता?” उसने मन ही मन सोचा। शायद कोई आवारा कुत्ता घुस आया हो। पर तुरंत ही उसे याद आया—इस घर में, इस उजाड़ हवेली में, कोई जानवर नहीं था। दूर-दूर तक किसी पालतू जानवर का कोई निशान नहीं था।
वह धीरे से बिस्तर से उठा। उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। दरवाज़ा थोड़ा सा भिड़का हुआ था। उसने हिम्मत करके दरवाज़ा थोड़ा और खोला। बाहर गलियारे में चाँदनी की मद्धम रोशनी खिड़कियों से छनकर आ रही थी, जिससे सब कुछ धुँधला और रहस्यमयी लग रहा था।
सीढ़ियों के पास वही मोड़—जहाँ कुछ देर पहले उसे एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई थी। और वहीं… जहाँ पहली बार उसे लगा था कि कोई उसे देख रहा है। एक पतली, शांत आकृति, अँधेरे में लगभग विलीन होती हुई—खड़ी थी, बिल्कुल स्थिर। देख रही थी, सिर्फ़ उसे ही देख रही थी, जैसे सब जानती हो, हर राज़, हर डर। उसका चेहरा स्पष्ट नहीं था, पर उसकी उपस्थिति इतनी प्रबल थी कि विवेक के रोंगटे खड़े हो गए। फिर एक कदम पीछे… और अँधेरे ने उसे ऐसे निगल लिया जैसे वह कभी वहाँ थी ही नहीं।
विवेक का दिल किसी पंछी की तरह ज़ोर-ज़ोर से फड़फड़ा उठा। उसने जल्दी से दरवाज़ा बंद नहीं किया, बस थोड़ा सा भिड़ा दिया। बिस्तर पर लौटकर भी उसे ऐसा लगता रहा—कोई अब भी वहीं, दरवाज़े के ठीक बाहर खड़ा है, चुपचाप, और उसकी हर साँस को सुन रहा है।
उस रात विवेक ठीक से सो नहीं पाया। हवेली जाग रही थी, और अपने साथ उसे भी जगाए हुए थी।
अध्याय 2: चश्मे की दरार
पहली भयावह रात के बाद, सुबह की किरणें जब हवेली की सदियों पुरानी दरारों में धीरे-धीरे उतर रही थीं, तो वे अपने साथ एक क्षणिक शांति का भ्रम लेकर आईं। उन धूल भरी, जर्जर दीवारों पर एक सुनहरी आभा तैर गई, मानो किसी दिव्य शक्ति ने उन्हें पवित्र करने का प्रयास किया हो। पर उस सुनहरी चमक में भी एक गहरी, अंतर्निहित उदासी छुपी हुई थी—जैसे किसी ने रात-भर जागकर अनगिनत सपने देखे हों, खूबसूरत भी और डरावने भी, और वो सपने अब भी उन दीवारों की हर ईंट, हर कण में साँस ले रहे हों, बाहर निकलने को आतुर।
विवेक पिछली रात लगभग नहीं सोया था। वह आकृति, वह परछाईं, और वे नंगे पाँवों की रहस्यमयी थापें उसके ज़ेहन में किसी दुःस्वप्न की तरह घूमती रहीं। वह खिड़की के पास गुमसुम खड़ा था, बाहर उजाड़ बगिया को ताकता हुआ। बगिया की सूखी, भूरी घास की नुकीली नोकें सुबह की हल्की हवा में ऐसे कांप रही थीं, जैसे उनमें भी रात की अनगिनत अनकही आवाज़ें, अनसुलझे रहस्य बस गए हों। हर टहनी, हर पत्ता जैसे पिछली रात का गवाह था।
माँ हमेशा की तरह सुबह जल्दी उठकर रसोई में थीं। बर्तनों के खटकने की आवाज़ें आ रही थीं, पर वे धीमी और अनजानी सी थीं—जैसे किसी और ही घर से, किसी और ही दुनिया से आ रही हों। उन आवाज़ों में रोज़मर्रा की सहजता नहीं, बल्कि एक दबा हुआ, यांत्रिक अनुष्ठान था। विवेक महसूस कर सकता था कि माँ भी रात भर ठीक से सोई नहीं हैं, उनके चेहरे पर थकान की एक अतिरिक्त परत चढ़ गई थी।
पिता बाहर आँगन में खड़े थे, हाथ में अख़बार था, जिसके पन्ने वे यंत्रवत् उलट-पलट रहे थे। मगर उनकी आँखें अख़बार की सुर्खियों पर नहीं, बल्कि कहीं और, शायद हवेली की ऊँची दीवारों, उनकी दरारों या उससे भी परे अतीत के किसी धुंधलके में टिकी थीं—जैसे वो पन्नों के पीछे छिपे किसी अदृश्य लेख को, हवेली के इतिहास को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों। उनके चेहरे पर भी वही अनकहा तनाव था जो कल से उन सबका पीछा कर रहा था।
विवेक का ध्यान बार-बार उसी एक दरवाज़े पर जा टिकता था—गलियारे के आखिर में, आधा खुला, धूल और मकड़ी के जालों से सना, स्टोर रूम का मनहूस दरवाज़ा। उस दरवाज़े में कुछ ऐसा था जो उसे बेचैन कर रहा था, अपनी ओर खींच रहा था। कभी-कभी उसे ऐसा लगता, जैसे उस दरवाज़े के पार, उस घने अँधेरे में, कोई अब भी मौजूद हो, कोई साँसें ले रहा हो, कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो। यह ख्याल इतना प्रबल था कि उसके रोंगटे खड़े हो जाते।
आखिरकार, वह अपनी बेचैनी के आगे हार गया। उसने अपनी जगह से उठकर दबे पाँव उस दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाए। हर कदम के साथ उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
दरवाज़े की चरमराहट—एक तीखी, कान फाड़ देने वाली चीख—हवेली की सुबह की खामोशी को बेरहमी से चीरती हुई फैल गई। विवेक को लगा जैसे उसने किसी सोए हुए दैत्य को जगा दिया हो।
भीतर घना, दमघोंटू अँधेरा था—और उसमें बसी थी एक ठंडी, थमी हुई, कब्र जैसी हवा, जिसमें बरसों की बंदिश और उपेक्षा की बू समाई थी। धूल की परतें इतनी मोटी थीं कि ज़मीन पर विवेक के जूतों के निशान स्पष्ट उभर आए। लकड़ी की पुरानी, टूटी-फूटी अलमारियाँ, जिन पर शायद कभी नक्काशी रही होगी, अब दीमकों का घर थीं। पीतल और लोहे के पुराने, ज़ंग लगे बक्से एक के ऊपर एक रखे थे, न जाने किन रहस्यों और यादों को अपने सीने में दबाए हुए। बिसरी हुई, गल चुकी किताबों का एक ढेर कोने में पड़ा था, उनके पन्ने पीले और भुरभुरे हो चुके थे—हर चीज़ पर धूल की मोटी, समय की चादर लिपटी थी।
हर चीज़ चुप थी, स्थिर, जैसे किसी श्राप से बंध गई हो। लेकिन हर एक वस्तु में, हर धूल कण में, कोई अनकहा गीत, कोई अधूरी दास्तान बसी हुई महसूस हो रही थी।
विवेक की उँगलियों ने सहसा ही एक पुरानी, नक्काशीदार लकड़ी की अलमारी को छुआ—जैसे वो किसी पुराने, भूले हुए पल को, किसी गुज़रे हुए इंसान के स्पर्श को छू रहा हो। लकड़ी ठंडी और खुरदरी थी।
तभी, अलमारी के एक छोटे, गुप्त से दिखने वाले खाने में, उसकी उँगलियों को कुछ और भी ठंडा, धातु जैसा महसूस हुआ। उसने उत्सुकतावश उसे टटोला।
एक चश्मा—सुनहरे फ्रेम वाला, गोल शीशों का, पूरी तरह धूल में डूबा हुआ। शायद दादाजी का।
उसने उसे उठा लिया। चश्मा उसकी हथेलियों में आते ही ऐसा लगा जैसे किसी ने बर्फ का एक टुकड़ा रख दिया हो—एक सिहरन उसके पूरे जिस्म में दौड़ गई। उसकी धड़कनें एक पल के लिए जैसे रुक गईं। यह कोई आम चीज़ नहीं थी, यह उसे पहली ही छुअन में महसूस हो गया था।
“इसे यहाँ क्यों छुपाया गया था?” उसने खुद से फुसफुसाकर पूछा। या शायद यह सवाल उसके दादाजी से था, या उस हवेली की आत्मा से।
उसने चश्मे पर जमी धूल को अपनी कमीज़ के कोने से सावधानी से पोंछा। सुनहरी फ्रेम अब भी धूमिल थी, पर शीशे थोड़े साफ़ हो गए थे। एक अजीब सी, अदम्य इच्छा से प्रेरित होकर, उसने वह चश्मा अपनी आँखों तक लाया—और पहन लिया।
पल भर के लिए सब कुछ वैसा ही रहा, फिर धीरे-धीरे स्टोर रूम का दृश्य धुँधला गया—और उस धुँधलके में, जैसे किसी और ही आयाम का पर्दा उठ गया हो, कुछ और ही नज़र आने लगा।
दीवारें अब सिर्फ़ ईंट और पलस्तर की सपाट सतहें नहीं लग रही थीं। उनमें असंख्य, बारीक, लंबी-लंबी दरारें उभर आई थीं—और वो दरारें, किसी पुराने, रहस्यमयी नक्शे की रेखाओं की तरह दिख रही थीं, जो किसी अनजाने खजाने या किसी भयावह रहस्य का मार्ग दर्शा रही हों।
उन दरारों में एक अजीब सी लय थी, एक स्पंदन था—जैसे किसी ने अपनी उँगलियों से कोई गुप्त, उदास धुन उन पर खींच दी हो, कोई अदृश्य संगीतकार अपनी रचना को प्रदर्शित कर रहा हो। विवेक को लगा जैसे वह उन दरारों को सिर्फ़ देख नहीं, बल्कि सुन भी सकता है।
उसने तेज़ी से चश्मा उतार लिया। सब कुछ फिर वैसा ही हो गया—धूल, पुरानी लकड़ी, ठंडी, स्थिर हवा। स्टोर रूम अपनी असलियत में लौट आया। लेकिन उसके दिल की धड़कनें अब वैसी शांत नहीं थीं। उसमें एक नया, गहरा डर था—और साथ ही उस रहस्य की ओर एक अनूठा, अदम्य खिंचाव भी। वह जान गया था कि उसे कुछ ऐसा मिल गया है जो उसे इस हवेली के और भी करीब ले जाएगा, चाहे वह कितना भी खतरनाक क्यों न हो।
दोपहर को तृषा आई। वह विवेक की बचपन की दोस्त थी और शायद अकेली इंसान जिससे वह अपने मन की उलझनें बांट सकता था। उसकी हँसी में हमेशा की तरह एक चंचलता, एक बेफिक्री थी, जो हवेली के बोझिल माहौल से बिल्कुल विपरीत थी। पर आज उसकी आँखों में भी हवेली को देखकर एक हल्की सी झिझक, एक अनजाना सा भय तैर रहा था।
“तू ठीक है, विवेक?” उसने हवेली के हॉल में कदम रखते ही विवेक के चेहरे को गौर से देखते हुए पूछा। “तेरा चेहरा उतरा हुआ है।”
विवेक कुछ देर चुप रहा, फिर धीरे से उसे स्टोर रूम की घटना और वह रहस्यमयी चश्मा दिखाया। तृषा ने चश्मे को अपने हाथ में लिया—जैसे किसी प्राचीन, पवित्र खजाने को छू रही हो। उसकी उँगलियाँ भी उसे छूते हुए हल्की सी काँपीं।
“ये… ये दादाजी का था?” उसने फुसफुसाकर पूछा, उसकी आँखों में आश्चर्य और थोड़ी सी घबराहट थी।
“हाँ, मुझे ऐसा ही लगता है,” विवेक ने कहा। “और… और जब मैं इसे पहनता हूँ… तो सब कुछ बदल जाता है।”
“कैसे बदल जाता है?” तृषा ने अपनी चंचल आँखों को सिकोड़ते हुए, धीमे स्वर में पूछा।
“जैसे… जैसे ये दीवारें कुछ कहने लगती हैं। जैसे हर दरार कोई अनकही कहानी हो, कोई राज़ हो।” विवेक की आवाज़ में अब भी उस अनुभव का विस्मय बाकी था।
तृषा ने कुछ पल सोचा, फिर चश्मा अपनी आँखों पर रख लिया। कुछ देर तक वह स्टोर रूम की दीवारों को, फिर हॉल की दीवारों को घूरती रही। फिर उतार कर बोली, “मुझे तो कुछ नहीं दिखा। सब वैसा ही है जैसा होना चाहिए। शायद थोड़ी ज़्यादा धूल है, बस।” उसकी आवाज़ में निराशा थी।
“शायद… शायद ये सब मेरी आँखों का, मेरे दिमाग का खेल है,” विवेक ने बुझे मन से कहा। पर उसे अपने दिल की गहराई में पता था—ये सब उसकी कोरी कल्पना नहीं थी। वह चश्मा खास था, और उसका असर सिर्फ़ उसी पर हो रहा था।
रात फिर अपनी पूरी भयावहता और रहस्य के साथ हवेली पर उतर आई। दीवारें फिर से जैसे साँस लेने लगीं, और हवा में अनगिनत फुसफुसाहटें तैरने लगीं। विवेक ने अपने कमरे में इंतज़ार किया जब तक उसे यकीन नहीं हो गया कि सब सो चुके हैं। फिर उसने दादाजी का वह चश्मा अपनी काँपती उँगलियों से उठाया और पहन लिया। उसकी साँसें गहरी और धीमी हो गईं, जैसे वह किसी समाधि में उतर रहा हो।
दीवारें फिर से बोलने लगीं—उनकी दरारों में कोई अनकही, धड़कती हुई कहानी थी। बारीक रेखाएँ किसी जीवित प्राणी की नसों की तरह स्पंदित हो रही थीं। फिर उसने देखा—वही आकृति। एक लड़की, पहले से कुछ ज़्यादा स्पष्ट, पर अब भी धुँधली, जैसे कोहरे से बनी हो। पर उसकी आँखें… वे बिल्कुल साफ़ थीं, बड़ी-बड़ी, और उनमें डर और गहरी करुणा एक साथ भरी हुई थी। वह उसे ही देख रही थी।
उस लड़की ने इस बार भी कुछ कहा नहीं। बस उसके होंठ हिले, जैसे वह बोलने की कोशिश कर रही हो, पर आवाज़ न निकल रही हो। विवेक ने ध्यान से देखने की कोशिश की, जैसे वह होंठों की भाषा पढ़ सके। उसे लगा जैसे वह कह रही हो—“मुझे देखो मत… मुझे सुनो…”
विवेक की साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। उसके कानों में अपने ही खून के बहाव की तेज़ आवाज़ ऐसे दौड़ने लगी जैसे कोई झरना फूट पड़ा हो। उसने घबराकर पीछे देखा—कमरे में और कोई नहीं था। वह अकेला था, उस लड़की की रहस्यमयी उपस्थिति के साथ।
अगली सुबह जब माँ रसोई में थीं, विवेक उनके पास गया। माँ के हाथ आटे में सने थे, पर उनकी उँगलियों में पानी की सुबह की ठंडक से ज़्यादा कोई और ही ठंडक बसी थी—और उनकी आँखों में वही पुराना, दबा हुआ डर था जो विवेक अब पहचानने लगा था।
“माँ, वो चश्मा… दादाजी का चश्मा… उसमें… उसमें कोई लड़की दिखती है,” विवेक ने हिम्मत करके कहा, आवाज़ भर्राई हुई थी।
माँ की उँगलियाँ जो परात में आटा गूंथ रही थीं, अचानक रुक गईं। उनके हाथों पर लगा सूखा आटा झड़कर नीचे गिरा। उन्होंने विवेक की ओर नहीं देखा।
“विवेक… कुछ चीज़ें… देखने के लिए नहीं होतीं,” उन्होंने बहुत धीमे, थके हुए स्वर में कहा। “और कुछ राज़… राज़ ही रहें तो बेहतर है।” उनकी आवाज़ में एक ऐसी गहरी थकान थी, जैसे किसी पुराने, कभी न भरने वाले दुख ने उसमें स्थायी रूप से घर बना लिया हो।
रात को विवेक फिर अपने कमरे से निकला। डर अब भी था, पर रहस्य को जानने की इच्छा उससे कहीं ज़्यादा प्रबल थी। वह धीरे से सीढ़ियों के पास उसी मोड़ पर गया, जहाँ पिछली रात उसे वह आकृति दिखी थी। काँपते हाथों से उसने चश्मा पहन लिया।
इस बार दरारें और भी गहरी, और भी स्पष्ट लग रही थीं—और उनमें, जैसे किसी ने खुरचकर लिखा हो, एक नाम उभर रहा था। धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर जुड़ता गया।
“अ-ना-मि-का।”
विवेक की साँसें जैसे एक पल को थम गईं। अनामिका। यह नाम उसके ज़ेहन में गूंजने लगा। कौन थी यह अनामिका? दादाजी से उसका क्या रिश्ता था? और वह उससे क्या कहना चाहती थी?
उसने धीरे से चश्मा उतारा। हवेली वही थी—खामोश, रहस्यमयी, और उदास। पर अब वो हवेली उसे सिर्फ़ एक पुरानी इमारत नहीं लग रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि हवेली उसे पहचानने लगी है। उसकी दीवारों के कान थे, उसकी खिड़कियों की आँखें थीं। और उसे यह भी पता था—यह रहस्य, यह नाम, अब उसके पीछे-पीछे आएगा, हर साँस में, हर धड़कन में, हर दरवाज़े की हर दरार में। खेल अब शुरू हो चुका था।
अध्याय 3: गवाह खिड़कियाँ
उस रात “अनामिका” नाम के रहस्योद्घाटन के बाद, सुबह की हवा में एक अजीब, बोझिल सी खामोशी थी, जो सामान्य सुबह की शांति से कहीं अधिक गहरी और अप्राकृतिक महसूस हो रही थी। हवेली की दीवारें जैसे अब भी पिछली रात की फुसफुसाहटों और रहस्यों को अपने सीने में दबाए, नींद में डूबी थीं। विवेक को ऐसा लग रहा था मानो हवेली अब उससे सीधे संवाद करने लगी हो, और यह अहसास उसे одновременно रोमांचित और भयभीत कर रहा था।
विवेक सुबह सवेरे ही जाग गया था, या यूँ कहें कि वह सोया ही कब था। वह अपने कमरे की उसी पुरानी, बड़ी सी खिड़की के पास बैठा था, जहाँ से बाहर उजाड़ बगिया का दृश्य दिखाई देता था। उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही खिड़की के ठंडे, धूल सने काँच पर थीं—और काँच पर उसकी अपनी परछाईं धुँधली, अस्पष्ट सी दिख रही थी। कभी-कभी उसे लगता, जैसे वो खुद को नहीं, किसी और को देख रहा हो; किसी ऐसे अजनबी को जिसकी आँखों में वही गहरी उदासी और अनसुलझे प्रश्न तैर रहे हों जो अब उसके मन में घर कर चुके थे। उसने आँखें ज़ोर से झपकाईं—पर परछाईं अब भी वही थी, किसी अनजाने, परेशान हमशक्ल की तरह उसे घूरती हुई। ‘अनामिका’ – यह नाम उसके मस्तिष्क में किसी मंत्र की तरह घूम रहा था।
माँ रसोई में थीं, उनके हाथों में हमेशा की तरह काम था। बर्तन धोते हुए उनकी उँगलियों में एक अजीब सी थकान थी, एक ऐसी थकान जो सिर्फ शारीरिक नहीं थी—जैसे हर धड़कन में, हर पानी की गिरती बूँद में कोई पुरानी, अनकही शिकायत बसी हो, कोई ऐसा दर्द जो बरसों से रिस रहा हो। उनके चेहरे पर एक स्थायी अवसाद ने डेरा डाल लिया था, जिसे वह छुपाने की असफल कोशिश करती रहती थीं।
पिता सुबह-सुबह ही आँगन में कुछ मरम्मत वालों से बात करने में व्यस्त हो गए थे। हवेली के कुछ हिस्सों की तत्काल मरम्मत की आवश्यकता थी। वे उनसे धीमे-धीमे, नपे-तुले शब्दों में बातें कर रहे थे—पर उनकी आँखें अक्सर दीवारों की उन गहरी, रहस्यमयी दरारों में उलझ जाती थीं, जैसे वे भी उन दरारों में कुछ तलाश रहे हों, या शायद उन दरारों से बचने की कोशिश कर रहे हों। ऐसा लगता था मानो वे इस जीर्ण-शीर्ण इमारत को ठीक करके उसके अतीत के बोझ को भी कम करना चाहते हों।
विवेक की नज़रें फिर से अपने कमरे की, और फिर हॉल की विशाल खिड़कियों पर टिक गईं। ये खिड़कियाँ पुरानी थीं, उनके कई शीशे चटके हुए थे, और लकड़ी के फ्रेम गलने लगे थे। पर विवेक जानता था—ये सिर्फ़ काँच और लकड़ी के टुकड़े नहीं हैं। ये गवाह हैं। मौन, स्थिर, पर सब कुछ देखने वाले गवाह।
ये वही खिड़कियाँ थीं, जिनसे हवेली ने बरसों से बाहर की बदलती दुनिया देखी थी। और बाहर की दुनिया ने हवेली के भीतर घटते न जाने कितने अनकहे नाटक। इन खिड़कियों ने हर मौसम का सामना किया था, हर खुशी, हर गम, हर चीख, हर सिसकी, हर साँस, हर आँसू को अपने भीतर जज़्ब किया था। उन्होंने दादाजी के आखिरी, बेचैन दिन देखे थे, और शायद… शायद अनामिका को भी।
विवेक ने एक गहरी साँस ली, जैसे हवेली की सारी घुटन को अपने भीतर भरने की कोशिश कर रहा हो। उसकी उँगलियाँ फिर से काँच पर टिक गईं। काँच सुबह की पहली किरणों में भी ठंडा था, और उसमें बसी थी एक पुरानी, सदियों की थकान, एक अनकहा इंतज़ार। उसे लगा, जैसे इन काँच की सिलवटों में, इन धूल कणों में, कोई धीमी, लगभग अश्रव्य फुसफुसाहट बसी हो। वे कुछ कहना चाहती थीं—कोई दबी हुई कहानी, कोई छुपी हुई पुकार, कोई चेतावनी।
दोपहर में तृषा फिर हवेली आई। आज उसकी चाल में वो पुरानी, स्वाभाविक चंचलता थोड़ी कम थी, और उसकी आँखों में डर की एक हल्की सी परछाईं भी तैर रही थी। शायद पिछली बार विवेक की बातों ने, या हवेली के माहौल ने, उस पर भी असर डालना शुरू कर दिया था।
“तू ठीक है, विवेक?” उसने धीमे से, लगभग सहमते हुए पूछा, जैसे किसी सोए हुए रहस्य को जगाने से डर रही हो। विवेक ने उसकी तरफ देखा। “हाँ, ठीक हूँ,” उसने कहा, पर उसके स्वर में खुद उसे भी यकीन नहीं था। वह कैसे ठीक हो सकता था जब उसके चारों ओर रहस्य और डर का जाल बुनता जा रहा था?
तृषा कुछ देर चुपचाप हॉल का मुआयना करती रही, फिर खिड़की के पास आकर विवेक के साथ बैठ गई। उसने भी झिझकते हुए काँच पर हाथ रखा। उसकी उँगलियाँ विवेक के स्पर्श से भी ज़्यादा काँप रही थीं।
“मैंने… मैंने कल गाँव में कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की थी,” तृषा ने दबी आवाज़ में कहा। “कोई भी इस हवेली के बारे में खुलकर बात नहीं करना चाहता। सब कहते हैं… ये हवेली कोई गहरा राज़ छुपाए हुए है। कुछ बुरा हुआ था यहाँ, बहुत पहले।” उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—डर और अदम्य उत्सुकता का एक मिश्रित भाव।
“हाँ,” विवेक ने कहा, उसकी आवाज़ भारी थी। “और मुझे लगता है… ये खिड़कियाँ सब देखती हैं। और ये दीवारें, इनकी दरारें… ये सिर्फ़ दरारें नहीं हैं।” वह नहीं जानता था कि वह तृषा को कितना बताए, कितना वह समझ पाएगी।
तृषा ने कुछ नहीं कहा। उसकी उँगलियाँ काँच पर ही ठहरी रहीं—जैसे वो भी कोई पुरानी, अनसुनी कहानी सुनने की कोशिश कर रही हो, हवेली की आत्मा से संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रही हो।
तभी, जैसे किसी अनजाने संकेत से प्रेरित होकर, माँ कमरे में आईं। उनके हाथ में एक पुरानी, चमड़े के जिल्द वाली डायरी थी। डायरी का रंग फीका पड़ चुका था और उसके पन्ने पीले हो गए थे।
“ये… ये तुम्हारे दादाजी की नहीं है,” माँ ने धीमे, लगभग काँपते हुए स्वर में कहा, डायरी विवेक की ओर बढ़ाते हुए। “ये मेरी है। बहुत पुरानी।” उनकी आँखों में वही चिरपरिचित थकान थी—और साथ ही एक ऐसा अनकहा सच, जिसे वो शायद कभी कहना नहीं चाहती थीं, पर आज परिस्थितियों ने उन्हें मजबूर कर दिया था।
विवेक ने काँपते हाथों से डायरी थामी। हवा में एक अजीब सा तनाव भर गया। उसने डरते-डरते डायरी खोली। पहले कुछ पन्ने खाली थे, फिर कुछ अधूरे, बिखरे हुए वाक्य थे—किसी भयभीत, अस्थिर मन की लिखावट।
“…अनामिका का चेहरा… बार-बार दिखता है… उन आँखों में कितना दर्द है…” “…वो हमारी रातों में आई थी… उसकी खामोश सिसकियाँ… कोई नहीं सुनता…” “…उसकी साँसें… इन खिड़कियों से आती थीं… ठंडी, बर्फीली…” “…ये दीवारें सुनती हैं… ये देखती हैं… ये घर… ये घर अब हमारा नहीं रहा…”
हर शब्द एक तीर की तरह विवेक के सीने में चुभ रहा था। ये माँ की लिखावट थी, पर इसमें उनकी आज की दृढ़ता नहीं, बल्कि किसी युवा, भयभीत लड़की की बेबसी और लाचारी झलक रही थी।
माँ ने एक पल के लिए उसकी आँखों में गहराई से देखा—उन आँखों में दर्द, डर और एक अनकही माफी का भाव था। फिर उन्होंने जल्दी से डायरी को विवेक के हाथ से लेकर बंद कर दिया, जैसे कोई ज़हरीला राज़ बाहर आ गया हो।
“कुछ बातें याद रखना… या उन्हें कुरेदना… अच्छा नहीं होता, बेटा,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ एक दबी हुई फुसफुसाहट थी—और आँखों में एक थकी हुई, पराजित सच्चाई। वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गईं, जैसे उस माहौल में एक पल भी और रुकना उनके लिए असहनीय हो।
रात फिर अपनी पूरी स्याह चादर ओढ़े हवेली पर उतर आई। हवेली की दीवारें और काली, और रहस्यमयी हो गईं। हवा में फुसफुसाहटें और बढ़ गईं। विवेक ने अपनी माँ की डायरी के शब्दों को याद करते हुए, दादाजी का वह रहस्यमयी चश्मा फिर पहना। उसने खिड़की के पार देखा—इस बार काँच बस काँच नहीं था। वो जैसे साँसें ले रहा था, धड़क रहा था। काँच की सतह पर अनगिनत छवियाँ तैरती और विलीन होती महसूस हो रही थीं।
फिर उसने देखा—अनामिका की परछाईं। पहले से कुछ ज़्यादा स्पष्ट, पर अब भी धुँधली, जैसे यादों की परतों में लिपटी हो। लेकिन उसकी आँखों में वही अनकहा, मर्मस्पर्शी सवाल था। उसकी ठंडी साँसें खिड़की के काँच को धुँधला कर रही थीं, जैसे वह बाहर की दुनिया से संपर्क साधना चाहती हो।
विवेक की धड़कनें किसी अनियंत्रित घोड़े की तरह दौड़ने लगीं। उसे लगा जैसे वह किसी और ही लोक में पहुँच गया है। फिर एक धीमी, स्पष्ट फुसफुसाहट—जो सीधे उसके मस्तिष्क में गूंजी—
“ये सिर्फ़ दरारें नहीं हैं… ये दरवाज़े हैं… अतीत के दरवाज़े…”
विवेक ने झटके से चश्मा उतार लिया। उसकी उँगलियाँ अपने आप खिड़की के काँच की उन दरारों पर फिसलीं, जिन्हें अब वह एक नए अर्थ में देख रहा था। दरवाज़े। कहाँ के दरवाज़े? क्या वह उन दरवाज़ों को पार कर सकता था? जैसे वो जानता था—अब ये सिर्फ़ उसका निजी डर या भ्रम नहीं था। ये हवेली की अपनी कहानियाँ थीं, जो उसके माध्यम से बाहर आना चाहती थीं।
उसने अपनी परछाईं को खिड़की में देखा। पर उसमें उसका चेहरा अब वैसा नहीं था जैसा सुबह था—वो बदल रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई आ गई थी, उसके नैन-नक्श में किसी और की झलक थी। शायद दादाजी की, या शायद किसी और की जिसे वह नहीं जानता था। और उसे यह भी पता था—ये बदलाव, ये रूपांतरण, अब रुकने वाला नहीं था। वह इस रहस्य में और गहरा धँसता जा रहा था।
अध्याय 4: गूँजता दरवाज़ा
अँधेरी रात अपनी चुप्पी में हर आवाज़ को और गहरा बना रही थी। हवेली की पुरानी, उखड़ी दीवारों पर चाँदनी का हल्का स्पर्श किसी भुतहा पर्दे की तरह लग रहा था। विवेक अपनी उँगलियों में दादाजी का चश्मा पकड़े बैठा था—उसके काँच पर हल्की सी नमी जम गई थी, जैसे उसकी साँसों की धुँधली परत किसी डर को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।
उसने चश्मा अपनी आँखों पर चढ़ा लिया। उसकी धड़कनें एक पल को थम-सी गईं। खिड़की के धूल सने काँच में दरारें अब पहले से ज़्यादा गहरी लग रही थीं—लंबी, खिंची हुई लकीरें, जिनमें जैसे किसी ने अपनी उँगलियों से कोई प्राचीन लिपि लिख दी हो। उन दरारों से धीमी, अस्पष्ट फुसफुसाहटें उठ रही थीं—कानों से नहीं, बल्कि मन के किसी कोने से सुनाई दे रही थीं।
“तहखाना…”
एक शब्द, बार-बार।
वह शब्द दरारों से रिसकर उसके भीतर समाता जा रहा था, जैसे हवेली की दीवारें उसे पुकार रही हों, उसे अपनी आत्मा में घसीट रही हों। विवेक ने काँपती उँगलियों से खिड़की की एक दरार पर हाथ फेरा। वह ठंडी थी—इतनी ठंडी कि उसकी हथेलियों में झुरझुरी दौड़ गई। उसे ऐसा लगा जैसे वह सिर्फ़ दीवार को नहीं, किसी अदृश्य, ठंडी साँस को छू रहा हो।
“तहखाना…”—अब वह शब्द उसकी धड़कनों की लय में बसा हुआ था। उसने चश्मा उतारा, पर शब्द नहीं मिटा। वह अब भी उसकी नसों में गूँज रहा था।
वह कमरे से बाहर निकला, और धीमे-धीमे कदम रखते हुए हॉल में पहुँचा। हॉल की ऊँची छत के नीचे झूलता पंखा अब भी अपनी उदास धुन गा रहा था—घर्र… घर्र… घर्र। हर घुमाव जैसे उस शब्द को दोहरा रहा था—तहखाना… तहखाना।
तृषा, जो उसी वक्त सीढ़ियों से उतर रही थी, उसकी बेचैनी को ताड़ गई। “क्या हुआ?” उसने धीरे से पूछा, उसके शब्द हॉल की चुप्पी में फिसलते हुए गुम हो गए।
विवेक ने एक गहरी साँस ली। “कुछ अजीब… अजीब सा महसूस हो रहा है, तृषा। ये दरारें… ये सिर्फ़ दरारें नहीं लगतीं। और उनमें से… मुझे एक शब्द सुनाई दे रहा है। तहखाना।” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई थी।
तृषा की आँखें फैल गईं। “तहखाना? हवेली में?” उसकी आवाज़ में डर था, पर एक चमक भी थी—जिज्ञासा की, जो उस डर से भी ज़्यादा प्रबल थी।
विवेक ने धीमे से सिर हिलाया। “हाँ। लगता है… जैसे हवेली खुद बता रही हो कि वहाँ कुछ है। जैसे तहखाना कोई दरवाज़ा है—किसी कहानी का, किसी छुपे हुए सच का।”
दोनों की आँखों में एक अनकहा संकल्प झलकने लगा। डर के बावजूद, वे जानते थे कि अब रुकना मुमकिन नहीं था। हवेली ने उन्हें पुकारा था, और वे उसकी पुकार सुन चुके थे। तहखाना अब उनका इंतज़ार कर रहा था।
सीढ़ियों से उतरकर वे हॉल के एक कोने में पहुँचे, जहाँ एक छोटा, सँकरा गलियारा दीवारों के बीच किसी भूले हुए सुरंग की तरह छुपा हुआ था। दीवारों पर लगे मोमबत्तियों के धुँधले निशान जैसे किसी पुराने ज़माने की कहानियाँ दोहरा रहे थे। हवा यहाँ और ठंडी थी—सीलन की गंध उसमें डूबी हुई थी, जैसे बरसों से किसी ने इस जगह को छुआ तक न हो।
तृषा की साँसें और तेज़ हो गईं। “विवेक… यहाँ सब कुछ… इतना अजीब क्यों है?” उसकी फुसफुसाहट दरारों में समा गई।
विवेक ने अपनी उँगलियों से दीवार को छुआ। दीवारें ठंडी थीं, नमी से भीगी हुईं, और उनके भीतर जाने कितनी आवाज़ें दबी थीं। उसके भीतर का डर उसके कदमों को रोकने की कोशिश कर रहा था, पर हवेली की वह गूँज—तहखाना… तहखाना—अब भी उसे खींच रही थी।
उनके कदमों की आवाज़—चर्र… चर्र…—एक लय में गूँज रही थी। जैसे इस गलियारे ने भी उन्हें पहचान लिया हो, जैसे वह उनका हर शब्द, हर सोच अपने भीतर दर्ज कर रहा हो।
आख़िरकार, गलियारा एक मोड़ पर ख़त्म हुआ। और वहाँ, दीवारों की छाया में छुपा हुआ, वह दरवाज़ा खड़ा था।
एक भारी, गहरा भूरा लकड़ी का दरवाज़ा, जिस पर लोहे की पट्टियाँ जंग से जकड़ी हुई थीं। हैंडल पर मकड़ी के जाले झूल रहे थे, और दरवाज़े के निचले हिस्से में किसी पुराने ज़ख्म की तरह एक गहरी दरार थी।
विवेक ने अपनी उँगलियों से जंग लगे हैंडल को छुआ। वह ठंडा और कठोर था—जैसे समय ने उसे पत्थर में बदल दिया हो। उसके भीतर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
तृषा ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया। “तू… तू यकीन से कह रहा है कि हमें ये दरवाज़ा खोलना चाहिए?” उसकी आवाज़ में डर था, पर उसकी आँखों में एक जिद भी।
विवेक ने धीरे से सिर हिलाया। “ये दरवाज़ा… जैसे मुझे बुला रहा है। जैसे ये सिर्फ़ लकड़ी और लोहे का नहीं, कोई गवाह है। और हमें इसे सुनना होगा, तृषा।”
तृषा ने अपनी साँस रोकी, फिर उसकी गिरफ़्त थोड़ी और मज़बूत कर ली। “ठीक है। पर जो भी हो… हम साथ रहेंगे, समझा?”
विवेक ने उसकी ओर देखा। “साथ। हमेशा।”
उसके बाद दोनों ने एक साथ उस जंग लगे हैंडल को थामा। दरवाज़े ने एक पल को जैसे अपनी जगह छोड़ने से इंकार कर दिया। फिर एक चरमराहट—किसी बीते युग की चीख की तरह—हवा में फैल गई।
दरवाज़ा, बहुत धीरे-धीरे, चर्र… चर्र… चर्र… करता हुआ खुलने लगा। अंधेरे का एक ठंडा झोंका उनके चेहरों पर पड़ा, और तहखाने की गंध—पुरानी, सड़ी-गली लकड़ी, सीलन और कुछ ऐसा जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता—उनकी साँसों में उतरने लगी।
विवेक और तृषा ने एक-दूसरे की ओर देखा। अँधेरा उनके सामने था—और उसमें उनका अतीत और उनके सवाल दबी साँसों के साथ उनका इंतज़ार कर रहे थे।
दरवाज़ा पूरी तरह खुलने पर जैसे तहखाने ने अपनी साँसें छोड़ दीं। अंधेरे ने एक झटका सा दिया, और उसकी ठंडी उँगलियाँ विवेक और तृषा के चेहरों पर रेंग गईं। सीलन की गंध इतनी गहरी थी कि जैसे वह फेफड़ों तक उतर कर हर शब्द को भीगाकर रख दे।
तृषा ने अपनी कमर से बँधी पुरानी, जली हुई मोमबत्ती निकाली—हवा की हल्की सरसराहट में उसकी लौ काँपती हुई जल उठी। उसका धुँधला उजाला तहखाने की ईंटों पर हिचकिचाता हुआ थिरकने लगा।
“इतना अँधेरा… जैसे सदियों से यहाँ कोई नहीं आया,” तृषा की आवाज़ टूटी हुई फुसफुसाहट में बदल गई। उसकी उँगलियाँ विवेक की बाज़ू में धँसी हुई थीं।
विवेक ने मोमबत्ती की लौ को अपनी हथेलियों से ढँकते हुए तहखाने की सीढ़ियों की ओर देखा। हर सीढ़ी धूल में लिपटी थी, हर कदम जैसे किसी दबी हुई याद को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था।
सीढ़ियाँ नीचे अंधेरे में विलीन हो रही थीं। विवेक ने गहरी साँस ली, जैसे अपनी हिम्मत को आवाज़ दे रहा हो। एक कदम। फिर दूसरा। उसके जूते की चर्र… चर्र… हर सीढ़ी पर गूँजती रही।
नीचे पहुँचते ही एक बोझिल, दमघोंटू सन्नाटा उनका स्वागत कर रहा था। तहखाने की दीवारें इतनी नमी में थीं कि उनकी साँसें भीग गई थीं—और हर दीवार पर, ईंटों के बीच, काई उगी हुई थी जो मखमल की तरह नरम थी पर उसमें कोई पुराना, भूला हुआ डर छुपा था।
विवेक की नज़र तहखाने के कोने में पड़ी एक पुरानी संदूक पर पड़ी। उसके चारों ओर मकड़ी के जाले झूल रहे थे, और उसकी लकड़ी फटी हुई थी। वह संदूक जैसे तहखाने का दिल था—या शायद उसकी कोई गुप्त नस।
“देख… देख वो संदूक…” विवेक ने फुसफुसाकर कहा।
तृषा ने डर के बावजूद अपनी नज़रें वहाँ गड़ा दीं। “किसका होगा ये? इसमें क्या छुपा होगा?” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसकी आँखों में एक बेचैन चमक थी।
विवेक ने मोमबत्ती को थोड़ा आगे किया, संदूक की दरारों से झाँकता काला अंधेरा अब और भी गहरा लग रहा था। उसने धीमे-धीमे हाथ बढ़ाया। लकड़ी की सतह ठंडी थी, और उसमें नमी की चिपचिपी परत। उसने महसूस किया जैसे उसके नीचे कोई धड़कन हो—धीमी, मगर ज़िंदा।
उसने तृषा की ओर देखा। दोनों की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। फिर—उसने संदूक का ढक्कन पकड़कर धीरे-धीरे उठाया।
ढक्कन चर्र… चर्र… करता हुआ खुला। अंदर अंधेरा और भी गहरा था, जैसे कोई नज़रें चुपचाप उन दोनों को देख रही हों।
विवेक ने महसूस किया—उस घुटन में, उस संदूक की गहराई में—अनामिका की छाया काँप रही थी। उसकी सर्द साँसें तहखाने की हवा में मिल रही थीं, और विवेक की हथेलियाँ ठंडी पसीने से भीग गईं।
संदूक के अंदर एक पुराना कपड़ा लिपटा हुआ था—पीला, धूल और नमी से सना हुआ। विवेक ने उसे उठाया। कपड़े में लिपटा कुछ भारी था—कुछ ऐसा जो बरसों से इस अँधेरे में छुपा हुआ था।
धीरे-धीरे कपड़ा हटाते ही उनके सामने एक दस्तावेज़ उभर आया। उसकी जिल्द जर्जर हो चुकी थी, कोनों पर काई उग आई थी। काग़ज़ भूरे पड़ चुके थे, जैसे किसी पुराने ज़माने की राख हो, जिसमें अनगिनत कहानियाँ दबी हुई थीं।
तृषा की उँगलियाँ काँपती हुई दस्तावेज़ पर फिसलीं। “ये… ये किसका है?” उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर उसकी आँखें सवालों से भरी हुई थीं।
विवेक ने दस्तावेज़ को मोमबत्ती की लौ के करीब किया। उन बेजान पन्नों पर कुछ शब्द उभर आए—हल्की, कांपती हुई लिखावट में।
“अनामिका…”
विवेक की साँसें जैसे किसी अदृश्य हाथ ने थाम लीं। यह नाम अब एक रहस्य नहीं, बल्कि एक जीवित हस्ताक्षर की तरह उनके सामने था।
उसने दस्तावेज़ को खोला। हर पन्ना जैसे खुद एक कहानी कहता था—कभी टूटी हुई, कभी अधूरी। शब्दों में डर था, दर्द था, और एक घुटा हुआ सन्नाटा भी।
“वो यहाँ रहती थी…” विवेक ने फुसफुसाकर कहा। “किसी ने लिखा है—‘उसकी आँखों में रात का अँधेरा था… उसकी साँसें इस हवेली की दीवारों में अटकी हुई थीं…’।”
तृषा ने उसके हाथ से दस्तावेज़ ले लिया। उसके हाथ भी काँप रहे थे, पर उसकी आँखों में जिज्ञासा की आग और तेज़ थी। “ये… ये सब दादाजी के समय का लगता है। जैसे किसी ने छुपकर ये सब लिखा हो, ताकि कोई जान न पाए।”
विवेक ने उसकी ओर देखा। “या… शायद ये हवेली खुद ही हमें ये बातें बताने की कोशिश कर रही है। जैसे हर शब्द—हर लकीर इस हवेली के दिल से निकली हो।”
दस्तावेज़ की इबारतें सीधी नहीं थीं। कई जगह पर शब्द मिट गए थे, स्याही धुँधली पड़ गई थी। पर हर लकीर में एक आवाज़ थी—जैसे अनामिका की साँसें उन पन्नों से फूट रही हों।
तृषा ने एक पन्ना पलटा। एक जगह लिखा था—“ये दीवारें दरवाज़े हैं… अतीत के दरवाज़े… और हर दरवाज़े के पीछे कोई छुपा सच…”
विवेक की आँखें चौड़ी हो गईं। “देख… ये वही शब्द हैं जो मैंने दरारों से सुने थे। हवेली हमें किसी दरवाज़े की ओर धकेल रही है, तृषा। ये सिर्फ़ दस्तावेज़ नहीं, ये इस घर का दिल है।”
तृषा ने दस्तावेज़ को अपनी छाती से लगा लिया। उसकी साँसें तेज़ थीं, पर उसके चेहरे पर एक विचित्र शांति भी थी। “अगर अनामिका यहाँ अब भी है, तो वो हमें अपनी कहानी बताना चाहती है। वो… हमसे कुछ कहना चाहती है।”
विवेक ने दस्तावेज़ के पन्नों पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को दिलासा दे रहा हो। तहखाने की हवा और भारी हो गई थी, जैसे हर शब्द बोलने से पहले एक आख़िरी साँस ले रहा हो।
“ये सिर्फ़ शुरुआत है, तृषा,” उसने धीमे, ठंडे स्वर में कहा। “ये हवेली… ये रहस्य… अब हमारे खून में उतर चुका है।”
दस्तावेज़ की आख़िरी पंक्तियाँ जैसे धीमे-धीमे हवेली के हर कोने में गूँजने लगीं। “ये दीवारें दरवाज़े हैं… अतीत के दरवाज़े…” हर शब्द तहखाने की सर्द हवा में घुलता चला गया।
विवेक ने दस्तावेज़ को बंद करके अपने सीने से लगा लिया। उसकी धड़कनें अब दस्तावेज़ की स्याही से बंधी हुई लग रही थीं। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे हवेली उसके भीतर उतर आई हो—हर साँस में, हर सोच में।
तृषा ने दस्तावेज़ को विवेक से लिया, उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। “विवेक… ये घर… ये कोई इमारत नहीं है। ये… ये जैसे कोई ज़िंदा चीज़ है। हर दीवार… हर दरार… जैसे कोई दिल हो, कोई दिमाग़।”
विवेक ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें अजीब सी गहराई से भरी थीं। “हाँ। ये हवेली… ये हमें देखती है, तृषा। हर पल। जैसे इसे पता हो कि हमारे दिल में क्या चल रहा है।”
वे दोनों एक पल के लिए चुप हो गए। तहखाने की सीलन और अँधेरा जैसे उनके सिर पर एक अदृश्य छत की तरह झुका हुआ था। हवा में नमी नहीं, एक अजीब सी गर्मी भी घुल गई थी—जैसे कोई साँसें लेता हो, कोई सुन रहा हो।
“मुझे लगता है,” विवेक ने धीमे, स्थिर स्वर में कहा, “ये दस्तावेज़ अनामिका की नहीं, हवेली की आवाज़ है। हवेली हमें ये सब दिखा रही है। ये… ये हवेली खुद बोल रही है।”
तृषा ने मोमबत्ती को थोड़ा ऊपर उठाया। उसकी लौ दीवार पर लंबी परछाइयाँ बना रही थी—जैसे दीवारें खुद ज़िंदा हो उठी हों, साँस ले रही हों।
“पर ये सब… डरावना भी है, विवेक,” तृषा ने काँपती आवाज़ में कहा। “मुझे लगता है हम जो कर रहे हैं… वो हमें कहीं ऐसे अँधेरे में ले जाएगा जहाँ से लौटना मुश्किल होगा।”
विवेक ने उसकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैं जानता हूँ,” उसने कहा। “लेकिन हम अब पीछे नहीं हट सकते। अनामिका की कहानी हमारी है। इस हवेली की कहानी… अब हमारे हिस्से की है।”
तहखाने की ठंडी दीवारें उनके चारों ओर खामोश थीं, पर उनमें जैसे एक धड़कता हुआ संगीत था—किसी अदृश्य दिल की धड़कन, जो अब दोनों की साँसों में मिल चुकी थी।
विवेक ने दीवार की दरार पर उँगलियाँ फिराईं—वो दरारें अब उसे किसी ज़ख्म की तरह नहीं, किसी नस की तरह महसूस हो रही थीं। नसें, जिनमें हवेली की अपनी यादें बह रही थीं।
उसने एक धीमी साँस ली। “ये हवेली… अब हमसे अलग नहीं है, तृषा। ये हमें अपना हिस्सा बना चुकी है।”
तहखाने की हवा, जो अब तक ठंडी और नमी से भरी थी, अचानक भारी और बेजान हो गई। दस्तावेज़ के हर शब्द जैसे दीवारों में गूँज बनकर धड़कने लगे।
विवेक और तृषा की साँसें रुक सी गईं। दस्तावेज़ के अंतिम पन्ने पर लिखा था—“जो इसे पढ़ेगा, वो मुझे देखेगा… और मैं उसके भीतर समा जाऊँगी…”
विवेक ने दस्तावेज़ को बंद कर दिया, पर शब्द अब भी उसकी नसों में गूँज रहे थे। उसने तृषा की ओर देखा—उसकी आँखों में वही डर और जिज्ञासा, दोनों घुलमिल गए थे।
तभी—एक झटका। तहखाने का दरवाज़ा, जो खुला हुआ था, धीरे-धीरे, पर अजीब सी ठंडी निश्चलता के साथ बंद होने लगा। चर्र… चर्र… चर्र…
तृषा ने एक तीखी, घबराई हुई साँस ली। “विवेक!” उसने विवेक का हाथ कसकर पकड़ लिया। दरवाज़ा आख़िरकार पूरी तरह बंद हो गया—एक आख़िरी, गूँजती हुई आवाज़ के साथ।
अब उनके चारों ओर घुप्प अँधेरा और वो दस्तावेज़ की स्याही में लिपटी हवा थी। मोमबत्ती की लौ काँप रही थी, जैसे किसी अदृश्य साँस ने उसे छू लिया हो।
फिर—एक फुसफुसाहट। इतनी धीमी कि लगा जैसे दीवारों के भीतर कोई औरत धीमे-धीमे साँस ले रही हो।
“तुमने मुझे ढूँढ लिया है…”
तृषा का चेहरा पीला पड़ गया। “ये… ये वही आवाज़ है… अनामिका की…”
विवेक ने दस्तावेज़ को और कसकर पकड़ा। “हाँ। उसने हमें देख लिया है… और अब… अब वो हमारे साथ है।”
फुसफुसाहट फिर गूँजी, थोड़ी और पास, थोड़ी और गहरी—“अब मैं तुम्हारे साथ रहूँगी…”
तहखाने की हवा घुटन भरी हो गई। ऐसा लग रहा था जैसे हर ईंट, हर लकड़ी का टुकड़ा साँसें ले रहा हो। दीवारें काँप रही थीं—या शायद ये दोनों का भ्रम था।
विवेक ने धीमे स्वर में कहा, “ये खेल अब शुरू हो चुका है, तृषा। अब ये हवेली… और अनामिका… हमारे हिस्से बन चुके हैं।”
वह पल अजीब सी चुप्पी में घुला हुआ था। एक धीमी, धड़कती हुई शुरुआत—जिसका कोई अंत नहीं था।
अध्याय 5: तहखाने की साँसें
अँधेरे तहखाने में मोमबत्ती की काँपती लौ जैसे एक ग़ुमनाम दिल की धड़कन थी। उसकी पीली, काँपती रोशनी में दस्तावेज़ के पुराने, स्याही से धुँधले पन्ने ऐसे चमक रहे थे, जैसे हर शब्द अपनी साँसें खुद लेकर आया हो।
विवेक ने दस्तावेज़ को फिर से खोला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर हर पन्ना जैसे उसकी धड़कनों के साथ गूँज रहा था। शब्दों के बीच से कोई धीमा, पुराना गीत फूटता लग रहा था—कोई अदृश्य धुन जो हवेली के दिल से उठ रही थी।
तृषा उसके पास बैठी थी, उसकी साँसें तेज़ और डरी हुई थीं। “ये दस्तावेज़… ये शब्द… जैसे… जैसे कोई हमें देख रहा हो,” उसने बमुश्किल फुसफुसाकर कहा। उसकी उँगलियाँ विवेक की कुहनी में धँसी हुई थीं, मानो वो खुद को ज़मीन से जोड़े रखना चाहती हो।
विवेक ने उसकी ओर नहीं देखा। उसकी नज़रें दस्तावेज़ के पन्नों पर थीं—काग़ज़ की दरारों में धँसी अनामिका की परछाईं। “ये शब्द… ये सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं हैं, तृषा,” उसने धीमे, लगभग खोए हुए स्वर में कहा। “ये शब्द… हमारे भीतर उतर रहे हैं। जैसे… ये हमें घेर रहे हैं।”
दस्तावेज़ की लिखावट—कभी साफ़, कभी टूटी—एक धीमी फुसफुसाहट की तरह तहखाने की हवा में घुलती जा रही थी। “ये दीवारें… ये दरवाज़े… ये हमारी साँसों से जुड़े हैं…”
तृषा की आँखों में डर और सवाल दोनों थे। “ये… ये कैसे हो सकता है? ये हवेली… ये सब सच में हो रहा है, ना?”
विवेक ने दस्तावेज़ के एक शब्द पर उँगली फेरी। “ये हवेली… ये हमें छू रही है, तृषा। देख, सुन… यहाँ सब कुछ ज़िंदा है। हर दीवार… हर दरार…” उसकी आवाज़ में एक गहरा, रहस्यमयी यक़ीन था।
तहखाने की हवा और भारी हो गई थी। एक सर्द, भीगी हुई साँस हर ईंट से फूटती महसूस हो रही थी। मोमबत्ती की लौ जैसे हर शब्द के साथ काँपती थी—हर फुसफुसाहट में एक नई कहानी, एक नया डर।
तृषा ने विवेक की ओर देखा—उसकी आँखों में पहली बार डर के अलावा कुछ और भी था। एक धीमी, थकी हुई स्वीकृति। “अगर ये सच है… अगर ये हवेली सच में हमें अपना हिस्सा बना रही है…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “तो हमें ये खेल खत्म करना होगा… या फिर खुद इसमें डूब जाना होगा।”
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से लगा लिया। उसकी उँगलियाँ उस पुराने काग़ज़ की नमी और ठंडक को महसूस कर रही थीं—जैसे अनामिका की ठंडी साँसें अब उसकी ही धड़कनों का हिस्सा बन गई हों।
तहखाने का सन्नाटा अब कोई खाली जगह नहीं था। वो सन्नाटा अब एक ज़िंदा, साँस लेता हुआ अँधेरा था—और विवेक ने जाना, अब कोई लौटने का रास्ता नहीं था।
तहखाने में मोमबत्ती की लौ ने एक क्षण के लिए एक लंबी, फटी हुई दीवार को रोशन कर दिया। वहाँ, दीवार के कोने में एक और दरवाज़ा झाँक रहा था—काई से ढँका, लोहे की पट्टियों से जकड़ा हुआ। मकड़ी के जाले उस पर ऐसे झूल रहे थे, जैसे सदियों की खामोश कहानियाँ उसमें उलझ गई हों।
तृषा की साँसें अचानक तेज़ हो गईं। “ये… ये नया दरवाज़ा… पहले दिखा नहीं था…” उसकी आवाज़ एक भयभीत विस्मय में डूबी हुई थी।
विवेक ने दस्तावेज़ की ओर देखा—उसकी उँगलियाँ अभी भी उन धुँधले शब्दों को सहला रही थीं। दस्तावेज़ के एक पन्ने पर, स्याही की दरारों के बीच, एक शब्द बार-बार उभरता था—“अन्तिम द्वार”।
“ये वही दरवाज़ा है, तृषा,” विवेक ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। “ये… ये अन्तिम द्वार है। और दस्तावेज़… हमें इसे खोजने के लिए ही यहाँ लाया है।”
तृषा ने काँपते हाथों से उसकी बाज़ू को थाम लिया। “लेकिन ये… ये दरवाज़ा क्यों? और अगर ये अन्तिम है… तो उसके पीछे क्या होगा?” उसकी आँखों में डर था—गहरा और ईमानदार।
विवेक ने उसकी ओर देखा, उसकी साँसें भी अब भारी हो रही थीं। “मुझे नहीं पता,” उसने धीरे से कहा। “पर ये दरवाज़ा… जैसे मुझे खींच रहा है। जैसे किसी ने इसे हमारे लिए ही बनाया हो। हर दरार… हर फुसफुसाहट… हमें यहाँ ला रही थी।”
वह एक कदम आगे बढ़ा, और उसकी उँगलियाँ दरवाज़े पर जम गईं। लकड़ी ठंडी थी, और उस पर जमी काई की गंध गीली, सड़ी हुई। जैसे इस दरवाज़े ने भी अपनी साँसों को बरसों से रोक रखा हो।
तृषा की उँगलियाँ अब भी उसकी बाज़ू पर जमी हुई थीं। “विवेक… ये दरवाज़ा… डर लगता है…” उसकी फुसफुसाहट एक दबी हुई चीख़ की तरह थी।
विवेक ने उसकी ओर सिर झुकाया। “डरना ठीक है। पर अब रुकना नामुमकिन है, तृषा। इस दरवाज़े के पीछे ही सब कुछ छुपा है। अनामिका… ये हवेली… ये दस्तावेज़…” उसकी आवाज़ में अब एक सम्मोहन था—जैसे वो खुद भी उस दरवाज़े का हिस्सा बन चुका हो।
तहखाने की हवा में फिर से वही धीमी फुसफुसाहट तैरने लगी। “अन्तिम… अन्तिम… अन्तिम…”
विवेक ने दरवाज़े पर अपना कान सटाया। दीवार के पार एक हल्की, मद्धम धड़कन सुनाई दे रही थी—जैसे कोई दिल, बहुत गहराई में, अब भी धड़कता हो।
वह दरवाज़ा अब सिर्फ़ एक दरवाज़ा नहीं था। वो एक जीवित चीज़ था—एक रहस्यमयी साँस, एक पुरानी आत्मा। और विवेक ने जाना—वो इसके आगे झुकने वाला नहीं था। वह इसके भीतर उतरने वाला था।
दरवाज़े के पास हवा कुछ और गाढ़ी, कुछ और बोझिल हो गई। मोमबत्ती की लौ हर पल काँपती और फिर सँभलती—जैसे उसका खुद का भी कोई डर हो।
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से चिपटाए रखा, उसकी उँगलियों की पकड़ कसती जा रही थी। दस्तावेज़ से एक हल्की, सर्द फुसफुसाहट उठ रही थी—इतनी धीमी कि लग रहा था जैसे शब्द सिर्फ़ हवा नहीं, सीधे उसके कानों में उतर रहे हों।
“तुमने मुझे खोज लिया है…”
विवेक की पलकों ने जैसे अपने आप एक बार झपक कर उस आवाज़ को सुन लिया। उसने दीवार पर अपनी नज़रें टिकाईं—वहाँ, दरवाज़े की लकड़ी पर, दरारों के बीच, उसे एक धुँधली आकृति नज़र आई।
तृषा ने उसकी आँखों की दिशा को महसूस किया। उसने भी दीवार की ओर देखा—और जैसे उसकी साँसें थम गईं।
“विवेक… वो… वो देख…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
दरवाज़े की लकड़ी पर एक परछाईं थी—एक औरत की, लहराती सी, धुँधली। उसकी आँखें दिखती नहीं थीं, पर उसकी मौजूदगी हर चीज़ से भारी थी। जैसे वो सिर्फ़ एक छवि नहीं, हवेली की धड़कती हुई याद हो।
विवेक ने एक धीमी, काँपती हुई साँस ली। उसकी उँगलियाँ दस्तावेज़ पर और कस गईं। “अनामिका…” उसने फुसफुसाकर कहा। ये शब्द अब उसके होंठों के लिए नहीं, उसके दिल की धड़कन के लिए थे।
परछाईं दीवार पर हौले-हौले हिल रही थी। उसकी हरकतें धीमी, लयबद्ध—जैसे वो कोई पुरानी लोरी गा रही हो। दीवार पर उसकी परछाईं की लहरें मोमबत्ती की लौ के साथ नाच रही थीं।
“मुझे लगता है… वो… वो हमसे कुछ कह रही है…” तृषा की आवाज़ टूटी हुई थी। उसके होंठ काँप रहे थे, पर उसकी आँखों में एक रहस्यमयी सम्मोहन था।
विवेक ने दरवाज़े पर अपनी हथेली रखी। “हाँ। वो हमें देख रही है। जैसे… जैसे वो जानती हो कि हम यहाँ क्यों आए हैं। हर शब्द… हर साँस में उसकी धड़कन है।”
एक पल को सन्नाटा गहराया। फिर वही फुसफुसाहट—दस्तावेज़ की आवाज़, और परछाईं की साँसें मिलकर एक नई धुन बुन रही थीं।
“तुम्हें डर नहीं लगता?” तृषा ने काँपती आवाज़ में पूछा। उसकी उँगलियाँ विवेक की कुहनी पर कसती जा रही थीं।
विवेक ने उसकी ओर देखा। “लगता है,” उसने कबूल किया। “पर इस डर में कुछ है… कुछ ऐसा जो खींचता है। जैसे ये हवेली… अनामिका… सब कुछ… पहले से हमारे खून में बह रहा हो।”
तृषा की आँखों में एक भीगा हुआ डर चमक गया। “ये… ये सब पागलपन है, विवेक। ये दीवारें… ये आवाज़ें… ये खेल…”
विवेक ने उसके चेहरे पर अपनी उँगलियाँ रखीं। “शायद ये पागलपन ही सच है, तृषा,” उसने बहुत धीमे कहा। “ये हवेली… ये अब सिर्फ़ पत्थर नहीं। ये साँसें लेती है। और मैं… मैं इसमें समाता जा रहा हूँ।”
उस पल, परछाईं ने जैसे हल्की सी करवट ली। उसकी धुँधली आकृति दरवाज़े की लकड़ी पर और गहरी हो गई। हवेली की हवा एक सर्द फुसफुसाहट में बदल गई—एक ऐसा गीत, जिसमें शब्द नहीं थे, पर अर्थ भरे हुए थे।
विवेक की उँगलियाँ दरवाज़े के ठंडे, फफूंद लगे हैंडल पर कस गईं। हर साँस में तहखाने की घुटन भरी नमी और काई की गंध थी। तृषा उसके ठीक पीछे खड़ी थी, उसकी हथेलियाँ बेतहाशा काँप रही थीं।
दरवाज़ा—कभी किसी समय की शान, अब जर्जर और अजनबी—अपनी जगह से हिलने लगा। चर्र… चर्र… चर्र… उसकी चरमराहट किसी बीते युग की नींद तोड़ती हुई गूँज रही थी।
अँधेरे में दरवाज़ा बहुत धीमे-धीमे खुला—एक लंबी, साँसें रोक देने वाली प्रक्रिया, जैसे हवेली ने खुद तय किया हो कि वो इस पल को खींचकर जीना चाहती है।
जैसे ही दरवाज़ा पूरी तरह खुला, एक ठंडी, भारी हवा ने उन्हें अपनी बाँहों में समेट लिया। वह हवा कुछ और नहीं, बल्कि सदियों की साँसें थीं—पुरानी, बोझिल, और किसी अनकहे राज़ से भरी हुई।
तृषा ने विवेक की कमीज़ का किनारा कसकर पकड़ा। उसकी आँखों में डर साफ़ था। “ये… ये जगह…” उसकी आवाज़ उसके होंठों पर ही मर गई।
विवेक ने एक कदम आगे बढ़ाया। मोमबत्ती की काँपती लौ उसके चेहरे पर अस्थिर परछाइयाँ बना रही थी। कमरे की दीवारों पर धुंधले चित्र उभर आए—किसी ने पुराने समय में यहाँ कुछ उकेरा था, और अब वो आकृतियाँ दीवार की सीलन में सिमटकर खो चुकी थीं।
दीवारों पर दरारें थीं, जिनमें मकड़ियों के जाले और काई उग आए थे। जैसे हर दरार ने अपने भीतर कोई अधूरी कहानी दबा रखी हो। फर्श पर टूटी मूर्तियों के टुकड़े बिखरे हुए थे—आधी टूटी हुई आँखें, अधूरी बाहें, सब कुछ जैसे किसी अधूरे देवता की प्रार्थना हो।
विवेक ने दस्तावेज़ की ओर देखा, उसकी उँगलियाँ अब भी उस पुराने काग़ज़ को थामे हुए थीं। दस्तावेज़ के शब्द जैसे मोमबत्ती की लौ में झिलमिला रहे थे—जैसे हर शब्द किसी अदृश्य धड़कन के साथ बज रहा हो।
“ये… ये अन्तिम द्वार है, तृषा,” विवेक ने धीमे, स्थिर स्वर में कहा। “इसके पीछे… हवेली की आत्मा छुपी है। और अनामिका…”
तृषा ने सिर झुकाया, उसकी साँसें अब भी अनियमित थीं। “ये जगह… इतनी ठंडी… जैसे ये दीवारें भी रो रही हों…”
फुसफुसाहटें अब और तेज़ हो गई थीं। दीवारों से आती हर आवाज़ जैसे एक ही बात कह रही थी—“तुम यहाँ आ गए हो… अब कोई लौटना नहीं…”
विवेक ने कमरे के भीतर एक और कदम बढ़ाया। मोमबत्ती की लौ अँधेरे में डगमगा रही थी, पर उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी—जैसे वो जानता था कि वो वही कर रहा है, जो उसे करना चाहिए।
हर ईंट, हर दरार—सब कुछ जैसे इस पल को देख रहा था। तहखाने के इस कमरे में हवेली का दिल धड़क रहा था—एक प्राचीन दिल, जो अब जाग उठा था।
कमरे की हवा और ठंडी हो गई थी—इतनी ठंडी कि विवेक की साँसें धुँधली होकर बाहर आ रही थीं। उसने दस्तावेज़ के पन्ने खोले। हर पन्ना जैसे उसके दिल के नीचे दबा हुआ था—वो दस्तावेज़ अब सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था, किसी भूली हुई आत्मा की चीख़ बन चुका था।
उसने पढ़ना शुरू किया। शब्द—टूटे हुए, पर अब भी जीवित।
“मैं अनामिका… मैं अब भी यहाँ हूँ… मैं दीवारों की साँसों में हूँ…”
उसके होंठ बुदबुदाए—उसकी आवाज़ दस्तावेज़ में खो गई।
तृषा उसके ठीक पास थी, उसकी आँखों में डर और जिज्ञासा एक साथ। “कौन थी वो, विवेक? कौन थी अनामिका?” उसकी फुसफुसाहट जैसे हवा में घुल गई।
विवेक की पलकों के पीछे एक-एक तस्वीर उभर रही थी—दादाजी का चेहरा, उनका कमरा, हवेली की दीवारों पर लहराती छवियाँ। जैसे दस्तावेज़ की हर स्याही की लकीर उसके भीतर का कोई दरवाज़ा खोल रही थी।
“ये… ये सिर्फ़ अनामिका की कहानी नहीं है, तृषा…” विवेक की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें एक डरावनी सच्चाई झलक रही थी। “ये… हमारे खून की कहानी है। दादाजी… ये हवेली… और अब… मैं।”
तृषा ने उसकी ओर देखा। “क्यों? क्यों लगता है जैसे सब कुछ पहले से लिखा हुआ था?” उसकी उँगलियाँ दस्तावेज़ के पन्नों को छू रही थीं—उस स्पर्श में एक काँपता यक़ीन।
विवेक ने आँखें बंद कर लीं। “क्योंकि ये हवेली… ये हमारी साँसों में उतर चुकी है। इसमें सिर्फ़ अनामिका का अतीत नहीं—मेरा भी है। जैसे… जैसे मैं हर दरार में अपने ही सवालों को देखता हूँ।”
कमरे की दीवारों पर धुँधले चित्र, टूटी मूर्तियाँ, और दस्तावेज़ की फुसफुसाहटें—सब कुछ एक समवेत लोरी बन गया था। हर शब्द—जैसे कोई धड़कन, कोई चेतावनी।
“मैं अब समझ रहा हूँ,” विवेक ने बहुत धीरे कहा। “ये खेल… ये सिर्फ़ भूतों का नहीं है। ये मेरे भीतर के अंधेरे का भी हिस्सा है। ये हवेली… ये दस्तावेज़… सब एक ही कहानी कह रहे हैं।”
तृषा की आँखों में आँसू भर आए। “अगर ये सब सच है… तो हम क्या करेंगे, विवेक? हम… हम यहाँ से बचेंगे कैसे?”
विवेक ने दस्तावेज़ को सीने से लगा लिया। “शायद बचना अब मुमकिन नहीं है, तृषा। ये सब… ये हमें निगल चुका है।”
कमरे की हवा एक पल को इतनी भारी हो गई कि उनकी साँसें टूटती-सी महसूस हुईं। और उस पल, उन्हें लगा—हवेली अब बस एक इमारत नहीं, उनका अतीत, उनका डर, और उनका भाग्य बन गई है।
कमरे की हवा अचानक सर्द हो गई। दस्तावेज़ के पन्ने जैसे खुद-ब-खुद काँपने लगे—हर शब्द एक जिंदा फुसफुसाहट बनकर दीवारों पर टकरा रहा था।
“अब तुम भी इस कहानी का हिस्सा हो…”
विवेक ने एक पल को आँखें बंद कर लीं। उस फुसफुसाहट में एक अजीब सी करुणा थी—और एक ऐसा डर, जो अब उसके अपने दिल की धड़कन जैसा था।
तृषा ने काँपती उँगलियों से उसका हाथ पकड़ लिया। “विवेक… ये… ये सब… जैसे अब हमसे अलग नहीं रहा,” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
विवेक ने उसकी ओर देखा—उसकी आँखों में डर, थकान, और एक अजीब किस्म का अपनापन था। “हाँ, तृषा,” उसने धीरे से कहा। “अब ये हवेली… ये अनामिका… ये सब कुछ… हमारा हिस्सा है। कोई और रास्ता नहीं बचा।”
उस पल, दीवारों से उठती फुसफुसाहट और तेज़ हो गई। कमरे का हर कोना जैसे एक साथ बोल उठा—“तुम्हें अब मुझसे अलग नहीं होना…”
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से चिपकाया। उसकी आँखें मोमबत्ती की काँपती लौ पर टिकी थीं—एक नन्हीं, काँपती सी उम्मीद। पर वो भी जानता था—अब ये लौ भी सिर्फ़ एक औपचारिकता थी।
“अब ये खेल नहीं, तृषा,” उसने फुसफुसाकर कहा। “अब ये हमारे खून की कहानी है। और हमें इसे पूरी तरह जीना होगा—चाहे इसमें डर हो या कोई और सच।”
तृषा की साँसें तेज़ थीं, पर उसके चेहरे पर भी एक दृढ़ता उभर आई थी। “साथ… हम साथ हैं, विवेक।”
कमरे में हवा जैसे भारी परदे की तरह लटक गई थी। हर दरार में, हर दरवाज़े की साँसों में—अब वही एक बात थी।
“अन्त की शुरुआत…”
विवेक ने मोमबत्ती की लौ को एक बार और देखा, फिर धीमे-धीमे उसे बुझा दिया। अँधेरा अब उनका अपना था—जैसे हवेली की साँसें उनके फेफड़ों में भर चुकी थीं।
वो पल—एक सर्द, गूँजता हुआ सन्नाटा। और उसमें एक नई, भयावह धड़कन का जन्म।
अध्याय 6: हवेली का गुप्त ह्रदय
अँधेरे तहखाने के और भीतर, विवेक और तृषा एक ऐसे गलियारे में उतरे, जो पहले किसी ने नहीं देखा था। दीवारें और भी पुरानी थीं—ईंटों पर नमी की गहरी लकीरें, और हवा में एक ऐसी सर्द लहर, जिसमें किसी भूली हुई आत्मा का कंपन था।
विवेक की उँगलियों में दस्तावेज़ अब भी था, लेकिन अब वह उसे पढ़ नहीं रहा था—वो शब्द उसके भीतर धड़कन की तरह समा गए थे।
तृषा ने मोमबत्ती को और ऊँचा उठाया। उसकी काँपती लौ ने दीवार पर कुछ उभरे हुए चित्र दिखाए—प्राचीन और सजीव।
उन चित्रों के बीच, दीवार पर उकेरा एक श्लोक जैसे हवा में फुसफुसाता था। उसका स्वर धीमा, लहराता हुआ—जैसे कोई अदृश्य प्रेम गीत।
“त्वमेव चित्ते मम स्पन्दनं च,
त्वमेव श्वासे मम जीवनं च।
त्वमेव दीपो निशि निर्जनेऽस्मिन्,
त्वमेव नादः शृणु सत्वरं च।।
विवेक ने धीमे स्वर में इन शब्दों को दोहराया। हर अक्षर जैसे हवेली की आत्मा में दर्ज था—हर शब्द में एक करुणा, एक रहस्यमय सौंदर्य।
“ये… ये गीत… ये शब्द जैसे इस हवेली की आत्मा बोल रही हो,” विवेक ने धीमे स्वर में कहा।
तृषा की उँगलियाँ दीवार पर चली गईं, उन उकेरे शब्दों की ठंडी खुरदरी सतह को महसूस करते हुए। “ये शब्द… जैसे किसी ने यहाँ प्यार और पीड़ा के बीच अपनी आत्मा बुन दी हो।”
दीवारें गूँज रही थीं—हर ईंट, हर दरार से वही प्रेम गीत निकल रहा था।
“त्वमेव गाथा मम रागिणी च,
त्वमेव धारा मम पावनी च।
त्वमेव ध्वनिः प्रलयं गतः स्यात्,
त्वमेव स्वप्ने मम चेतना च।।
हर शब्द में एक कहानी थी—जैसे अनामिका का स्पर्श, उसकी साँसें, उसकी छुपी हुई चीख़।
विवेक की पलकों के नीचे एक-एक दृश्य कौंधा—दादाजी के चेहरे की परछाईं, हवेली के दरवाज़े, और अनामिका की वो सर्द आवाज़।
“ये हवेली… ये दीवारें… ये शब्द… सब हमारे खून में बहने लगे हैं, तृषा,” विवेक ने धीरे से कहा। “अब ये प्रेम गीत नहीं—ये हमारी साँसें हैं।”
तृषा ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में डर के साथ-साथ एक थकी हुई स्वीकृति थी। “हाँ,” उसने बमुश्किल कहा। “ये हवेली अब हमें वापस नहीं करेगी…”
कमरे की हवा भारी थी, हर दीवार पर वही गीत गूँजता था—एक ऐसी धड़कन, जिसमें कोई अंत नहीं था।
वेक और तृषा ने धीरे-धीरे उस कमरे में कदम रखा, जहाँ दीवारों पर नमी और समय की मोटी परत थी। मोमबत्ती की लौ एक गीली महक को और भी तीव्र बना रही थी, जैसे दीवारों के भीतर कोई साँसें छोड़ रहा हो।
विवेक की नज़रें उन दीवारों पर खिंची उभरी रेखाओं पर टिक गईं। पहले वो महज़ फटी हुई दरारें लग रही थीं, पर अब… अब वो किसी प्राचीन लिपि का हिस्सा बन गई थीं।
“देखो, तृषा,” उसने धीमे स्वर में कहा। “ये कोई साधारण दरारें नहीं हैं… ये जैसे कोई पुराना शिलालेख हो, कोई चेतावनी या… कोई प्रार्थना।”
तृषा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “किसने लिखा होगा ये सब? ये भाषा तो… इतनी अजीब है, विवेक…”
विवेक ने मोमबत्ती की लौ उन शब्दों पर पास ले जाकर टिकाई। दरारों के बीच कुछ अक्षर उभर आए—जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें पत्थर पर खींचा हो।
“मुक्ति… रक्त… प्रतिज्ञा…”
विवेक की साँसें अटक गईं। ये वही शब्द थे जो दस्तावेज़ में भी लिखे थे। एक झटका-सा महसूस हुआ—जैसे दस्तावेज़ और ये दीवारें एक-दूसरे से फुसफुसाकर बातें कर रहे हों।
“ये… ये दस्तावेज़ के शब्द हैं, तृषा,” उसने फुसफुसाया। “जैसे ये सब… हवेली के अतीत की परतें हों। हम इनके बीच में फँस गए हैं।”
तृषा की उँगलियाँ दीवार पर फिसलीं। हर शब्द में एक ठंडी, सर्द लय थी—एक फुसफुसाहट, जो सीधे उसकी साँसों में उतर रही थी। “ये शब्द… जैसे इन दीवारों में क़ैद आत्माओं की कहानियाँ हों, विवेक।”
कमरे की छत से एक बूँद—पुरानी सीलन की बूँद—टपकी और ज़मीन पर गिरते ही जैसे किसी पुराने नगाड़े की धीमी थाप हो गई।
विवेक ने गहरी साँस ली। “ये शब्द… ये शिलालेख… ये सब अनामिका की कहानी का हिस्सा हैं। वो… वो सब कुछ बताना चाहती है, पर अपने ही शब्दों में, अपने ही संगीत में।”
तृषा ने मोमबत्ती को और ऊँचा किया। उसके पीले उजाले में दीवारों पर उकेरे हुए ये शब्द किसी प्राचीन वेद की तरह लगे—भूले हुए देवताओं के नाम, डर और भक्ति के बीच झूलते हुए।
“विवेक… क्या ये सब सच है?” तृषा की आवाज़ धीमी थी। उसकी आँखों में डर के साथ एक जिज्ञासा भी थी।
विवेक ने दस्तावेज़ को सीने से लगाकर कहा, “हाँ। और ये सच ही हमें खींच रहा है। जैसे ये हवेली चाहती है कि हम इन शब्दों में अपनी ही कहानी पढ़ें…”
दीवारों पर शिलालेखों की लकीरें और गहरी होती गईं। जैसे हर दरार में एक नई कहानी थी—और वो अब तृषा और विवेक को बुला रही थी।
कमरे की हवा अब सर्द और गहरी थी—जैसे दीवारों में छुपा अतीत अपनी साँसें भर रहा हो। मोमबत्ती की काँपती लौ विवेक और तृषा के चेहरों पर परछाइयाँ बनाकर थिरक रही थी।
विवेक की उँगलियाँ दस्तावेज़ की जर्जर जिल्द पर फिसल रही थीं। हर शब्द अब एक धड़कती हुई पुकार बन गया था—धीमी, मगर ज़िंदा।
“मैं अनामिका… मैं अब भी यहाँ हूँ…”
विवेक ने दस्तावेज़ को थोड़ा और पास किया। उसकी आँखें उन धुँधले शब्दों में डूब रही थीं—जैसे किसी और की आँखें उसके भीतर उतर रही हों।
“तृषा…” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। “मैं… मैं उसकी साँसें सुन सकता हूँ। वो… वो यहीं है। इस हवेली में, इन दीवारों में…”
तृषा की साँसें रुक गईं। उसकी उँगलियाँ विवेक की कलाई पर कस गईं। “विवेक… ये सब… ये सच में हो रहा है, ना?” उसकी आँखों में डर का आँसू चमक उठा।
विवेक ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था—बल्कि एक अजीब सा अपनापन था, एक सम्मोहन। “हाँ। ये सब… ये सच है। अनामिका हमें देख रही है। सुन रही है। और वो चाहती है कि हम उसकी कहानी जानें।”
कमरे की हवा एक पल को काँपी। दीवारों से आती फुसफुसाहटें और तेज़ हो गईं—जैसे अनामिका अब सीधे बोल रही हो।
“त्वमेव चित्ते मम स्पन्दनं च…”
(“तुम ही मेरे चित्त में स्पंदन हो…”)
विवेक के होंठ भी फुसफुसाने लगे। उसकी आवाज़ में वही सर्द धुन थी—जैसे अनामिका उसके भीतर उतर गई हो।
“वो… वो मुझे अपने गीत में खींच रही है, तृषा,” विवेक ने धीमे, डरे हुए स्वर में कहा। “जैसे… जैसे मैं उसकी परछाईं का हिस्सा बनता जा रहा हूँ…”
तृषा की उँगलियाँ अब विवेक के चेहरे को थाम चुकी थीं। “हम यहाँ साथ आए थे, विवेक,” उसने काँपती आवाज़ में कहा। “अगर वो तुम्हें खींच रही है… तो मैं भी तुम्हारे साथ जाऊँगी।”
फुसफुसाहटें अब कमरे की हर ईंट में बसी लग रही थीं—हर साँस, हर शब्द। दीवारों पर लहराती परछाईं अब साफ़ थी—एक धुँधला चेहरा, गीली आँखें, और सर्द साँसें।
“तुमने मुझे खोज लिया है…”
विवेक की आँखें अब पूरी तरह अनामिका की आँखों में डूब चुकी थीं। उसकी आवाज़ एक दबी हुई दहलीज से फूट पड़ी। “मैं… मैं अब उसका हिस्सा हूँ, तृषा। इस हवेली का हिस्सा… अनामिका का हिस्सा…”
उस पल, कमरे की हवा जैसे ठहर गई। दीवारें सुन रही थीं—और हवेली ने अपनी बाँहें और कस ली थीं।
दीवारों से आती फुसफुसाहटें जैसे किसी अदृश्य परदे के पीछे का संगीत थीं। हर शब्द, हर साँस अब एक कहानी बन गया था—जिसमें विवेक और तृषा न चाहते हुए भी बँधते चले जा रहे थे।
विवेक ने दस्तावेज़ को मोमबत्ती की लौ के पास किया। पन्नों पर एक जगह—कोई अधूरा चित्र उभर आया। एक धुँधला चेहरा, और उसके नीचे कुछ टूटी हुई पंक्तियाँ।
तृषा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “ये… ये कौन है? ये चेहरा… ये तो अनामिका का नहीं लग रहा…”
विवेक ने उस चित्र को गौर से देखा। चेहरे के पीछे धुँधली परछाईं—जैसे कोई बुज़ुर्ग आदमी, गंभीर आँखें और थका हुआ चेहरा। “ये… ये दादाजी हो सकते हैं…” उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई पुरानी याद फिर से जाग उठी हो।
तृषा की आँखें चौड़ी हो गईं। “क्या मतलब है तुम्हारा? दादाजी… अनामिका… इनका क्या रिश्ता था?”
विवेक ने गहरी साँस ली। “शायद… ये दस्तावेज़ सिर्फ़ अनामिका की कहानी नहीं। ये दादाजी की भी कहानी है। उनका जुड़ाव… उनका कोई ऐसा सच, जो कभी किसी ने नहीं बताया।”
कमरे की हवा और भारी हो गई थी। दीवारों पर बने पुराने चित्रों में अब वो धुँधली छवि और भी स्पष्ट होने लगी। जैसे हर दरार उस पुराने चेहरे को पुकार रही थी।
फिर दस्तावेज़ के एक पन्ने पर एक टूटी-फूटी पंक्ति—
“उसके लिए मैंने ये घर त्यागा… उसके लिए मैंने इस हवेली की आत्मा को सौंप दिया…”
तृषा ने काँपते स्वर में पढ़ा, “उसके लिए… अनामिका के लिए?”
विवेक की उँगलियाँ दस्तावेज़ पर कस गईं। “हाँ। दादाजी ने… उन्होंने अनामिका को इस हवेली में क़ैद कर दिया। शायद जानबूझकर, या किसी सौदे के तहत। ये सब… ये सब उनका ही किया हुआ है।”
एक पल के लिए दोनों के बीच सन्नाटा छा गया। दीवारों की सीलन में अब एक नई गंध थी—जैसे पुराने खून की महक, जो दस्तावेज़ के शब्दों में भीग गई हो।
तृषा ने धीमे से कहा, “अगर ये सच है, विवेक… तो तुम… तुम इस हवेली की विरासत हो। ये सब… ये सब तुम्हारे खून में है।”
विवेक ने उसकी बात सुनकर एक काँपती साँस ली। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ डर नहीं था—एक कड़वा यक़ीन भी था। “हाँ। और इसीलिए… इसीलिए ये सब मेरे पास लौट आया है।”
कमरे में हवा जैसे और गाढ़ी हो गई। दस्तावेज़ की स्याही अब दीवारों की दरारों में बहने लगी थी—एक निशान, जो अब मिटाया नहीं जा सकता था।
कमरे की हवा अब इतनी ठंडी हो चुकी थी कि हर साँस एक धुँधली भाप की तरह बाहर निकलती। मोमबत्ती की काँपती लौ दीवारों की दरारों पर नाच रही थी—जैसे उन दरारों से कोई अदृश्य चेहरा झाँक रहा हो।
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से और कसकर चिपका लिया। उसके हाथ अब काँप नहीं रहे थे—उसके भीतर का डर जैसे किसी नई ज़िद में बदल चुका था।
“तृषा,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। “ये सब… ये अब महज़ कोई कहानी नहीं। ये मेरा सच है—मेरा… मेरा भार।”
तृषा की आँखों में आँसू थे, पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। “तो क्या अब हम बस… इस हवेली का हिस्सा बनकर रह जाएँगे?”
विवेक ने उसकी आँखों में देखा। “नहीं। अगर ये हवेली हमें क़ैद करने आई है, तो हमें भी इसे जवाब देना होगा।”
कमरे की हवा और भी भारी हो गई—जैसे हर ईंट सुन रही हो। दस्तावेज़ की स्याही से एक फुसफुसाहट उठी—“अन्तिम… अन्तिम…”
विवेक ने दीवार पर अपनी हथेली रख दी। “मैं… मैं कसम खाता हूँ,” उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट से भी धीमी थी, पर उसमें आग थी। “अगर ये हवेली मुझे अपने खून में समेटेगी, तो मैं भी इसे अपने दिल में कैद करूँगा। कोई डर… कोई चीख़… कोई सन्नाटा… मुझे रोक नहीं पाएगा।”
तृषा ने उसकी कलाई थाम ली। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन उसकी पकड़ मज़बूत। “तो फिर साथ… हर कदम पर,” उसने काँपती आवाज़ में कहा।
दस्तावेज़ की फटी हुई पंक्तियों के बीच एक नया शब्द उभरा—“क़ैद”।
“ये हवेली… ये दस्तावेज़… ये अब सिर्फ़ हमारे हाथ में नहीं, तृषा। ये हमारे खून में उतर गया है। हर साँस में, हर सोच में…” विवेक ने बहुत धीरे से कहा।
कमरे की हर दरार अब जैसे उनकी बातचीत को अपने भीतर दर्ज कर रही थी—हर शब्द, हर स्पर्श।
फिर दीवार से वही धीमी आवाज़ आई—जैसे अनामिका अब और पास आ गई हो।
“अब तुम भी मुझसे अलग नहीं हो…”
विवेक की आँखें ठंडी चमक से भर गईं। “हाँ। मैं अब अलग नहीं हूँ… और तुम भी इस खेल का हिस्सा हो, अनामिका।”
उस पल, मोमबत्ती की लौ एक बार काँपी—जैसे हवेली ने उनकी कसम को सुन लिया हो। और दीवारों की दरारें एक पल के लिए साँस लेती लगीं—जैसे हवेली ने अपनी क़ैद को खुद कबूल कर लिया हो।
अँधेरे में एक सर्द शांति उतर आई—और उसी में उनकी साँसें मिलीं, जैसे हवेली का दिल अब उनकी धड़कन बन गया हो।
अध्याय 7: अन्तिम द्वार की दस्तक
अँधेरे गलियारे में, अन्तिम द्वार के सामने खड़े विवेक और तृषा की साँसें जैसे ठहर गई थीं। मोमबत्ती की लौ अब एक काँपता दीपक बन गई थी—हर लहराती रोशनी में दीवारों पर अनामिका की परछाईं झिलमिला उठती।
विवेक की उँगलियाँ दस्तावेज़ की जिल्द पर कस गई थीं। उसकी उँगलियों में अब कोई कंपन नहीं था—एक गहरी शांति थी, जो भीतर के तूफ़ान का हिस्सा थी।
तृषा की उँगलियाँ उसके कंधे पर थी, उसका चेहरा सर्द और गंभीर। “ये वही जगह है, विवेक,” उसने धीरे से कहा। “ये दरवाज़ा… ये किसी कब्र की तरह है।”
विवेक ने दरवाज़े की लकड़ी को छुआ। ठंडा, सीलन से सना हुआ—जैसे किसी आत्मा की सर्द साँस। हर दरार में अनामिका की फुसफुसाहट गूँज रही थी—धीमी, मगर इतनी पास कि दिल की धड़कनों में समा जाए।
“अब तुम आ गए हो…”
विवेक की साँसें गहरी हो गईं। “सुन रही हो?” उसकी आवाज़ में डर से ज़्यादा एक अपनापन था।
तृषा की आँखें चौड़ी हो गईं। “ये… ये फुसफुसाहट… ये तो जैसे दीवारें बोल रही हों, विवेक।”
दस्तावेज़ की स्याही में कुछ शब्द उभर आए। मोमबत्ती की लौ से वो शब्द चमक उठे—“रक्त… प्रतिज्ञा… आत्मा…”
विवेक ने धीमे से फुसफुसाया, “ये सब कुछ… एक लय में बँध गया है, तृषा। जैसे हर शब्द, हर दीवार… हमें इस दरवाज़े तक लाने के लिए साँसें ले रही थी।”
अन्तिम द्वार की लकड़ी पर एक धुँधली लकीर थी—किसी ने नाखून से खुरचकर कुछ लिखा था।
“स्वप्न और जागरण का संगम…”
तृषा ने उसे पढ़ते हुए काँपती आवाज़ में कहा, “ये… ये क्या मतलब है?”
विवेक ने उसकी ओर देखा। “शायद… इस दरवाज़े के पार वो सच है, जो अब तक सिर्फ़ स्वप्न में था। और अब… अब वो हमें जगाने वाला है।”
उसने दरवाज़े पर अपनी हथेली रख दी। जैसे ही उसने उसे छुआ, एक अजीब सी कंपकंपी पूरे कमरे में दौड़ गई। हवेली की दीवारें, जो अब तक महज़ ईंटें थीं, जैसे एक जीवित देह बन गईं—हर ईंट धड़कने लगी।
मोमबत्ती की लौ अचानक एक पल को भभक उठी, और फिर धीमे-धीमे काँपने लगी। उसके उजाले में अन्तिम द्वार की दरारें और गहरी दिखने लगीं—जैसे उन दरारों के भीतर कोई साँसें ले रहा हो।
“ये दरवाज़ा… ये हमें बुला रहा है,” विवेक ने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में अब एक पवित्रता थी—जैसे वो खुद किसी प्राचीन मंत्र का हिस्सा हो गया हो।
तृषा ने उसकी ओर एक आख़िरी बार देखा। उसकी आँखों में डर के साथ वो आँसू भी थे, जो हर मोड़ पर प्यार की गहराई में डूबते हैं। “साथ हैं, विवेक,” उसने बमुश्किल कहा। “जैसे तुमने कसम खाई… वैसे ही मैं भी।”
विवेक ने उसकी ओर सिर हिलाया। उसकी साँसें भारी थीं, लेकिन उसकी आँखें शांत। “हाँ, तृषा। अब ये दरवाज़ा… और ये हवेली… हमारा हिस्सा हैं। और अब—हम इसके हिस्से।”
उस पल, दरवाज़े की लकड़ी से एक धीमी, खोई हुई दस्तक सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
जैसे किसी ने सदियों से बन्द इस द्वार के पार से दस्तक दी हो।
तृषा की उँगलियाँ उसकी कलाई में धँस गईं। “विवेक… ये दस्तक… ये तो जैसे… कोई भीतर से हमें बुला रहा हो…”
विवेक की आवाज़ धीमी थी—एक गहरी, थकी हुई साँस की तरह। “हाँ। ये अन्तिम द्वार की दस्तक है, तृषा। और ये हमें बता रही है—अब कोई लौटना नहीं।”
अन्तिम द्वार की दस्तक कमरे की हवा में एक डरावनी धुन बन गई थी—हर ठक… ठक… में एक अनकहा सवाल, एक भूला हुआ दर्द।
विवेक ने एक गहरी साँस ली और मोमबत्ती की लौ को दरवाज़े के करीब ले गया। लकड़ी की दरारों में अब जैसे अनामिका की परछाईं थरथरा रही थी—धीमी, मगर स्पष्ट।
“ये… ये दरवाज़ा अब महज़ एक लकड़ी का टुकड़ा नहीं है, तृषा,” उसने फुसफुसाते स्वर में कहा। “ये अनामिका का चेहरा है… उसकी साँसें… उसकी पुकार…”
तृषा की उँगलियाँ विवेक के कंधे में धँस गईं। उसकी आँखों में एक रहस्यमयी खौफ था—जैसे वो किसी अँधेरे कुएँ में झाँक रही हो। “विवेक… हम सच में इसके पार जाना चाहते हैं?”
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से लगा लिया। “ये सिर्फ़ हमारी चाहत नहीं है, तृषा। ये… ये हमारी किस्मत है। ये दरवाज़ा… और इसके पीछे छुपा सच… ये सब हमारे खून में बसा है।”
वो दरवाज़ा अब खुद-ब-खुद धीरे-धीरे चरमराने लगा। दीवारों पर उभरीं लकीरें मोमबत्ती की लौ में और गहरी दिखने लगीं—हर लकीर जैसे किसी कहानी की नब्ज़।
तृषा ने काँपते स्वर में कहा, “विवेक… ये दस्तावेज़… ये दीवारें… सब तुम्हें किसी और ही दुनिया में खींच रहे हैं। मुझे डर लगता है कि… तुम खुद को खो दोगे।”
विवेक ने उसकी आँखों में देखा। “तृषा… मैं खुद को नहीं खो रहा। मैं उस हिस्से को पा रहा हूँ, जो हमेशा मुझसे छुपा रहा। और अगर अनामिका की आत्मा इस सबके पीछे है—तो मुझे उसे समझना होगा। उसे मुक्त करना होगा।”
उसके शब्द हवा में गूँजने लगे। कमरे में दीवारें जैसे उन्हें सुन रही थीं—हर ईंट, हर दरार, हर सर्द फुसफुसाहट।
फिर—विवेक ने दरवाज़े की लकड़ी पर अपनी हथेली रख दी। एक पल में उसके ज़हन में जैसे समय रुक गया। उसके चारों ओर मोमबत्ती की लौ की हल्की गंध, दीवारों की सीलन, और दस्तावेज़ की स्याही की खुशबू—सब कुछ गायब हो गया।
उसने देखा—एक औरत का चेहरा, आधा धुँधला, आधा रोशन। उसकी आँखें पीड़ा से भरी थीं—और उसमें एक करुण पुकार थी।
“अनामिका…” विवेक के होंठों से ये नाम खुद-ब-खुद फिसल गया।
तृषा ने भी उस चेहरे को देखा। उसकी साँसें थम गईं। “वो… वो हमें देख रही है, विवेक,” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
अनामिका की आँखें अब इतनी साफ़ थीं कि लगता था, वो सीधे उनके दिलों में उतर गई हों। उसके होंठ हिले—शब्द नहीं, बस एक गीत। एक फुसफुसाहट।
“मुक्त करो… मेरा सच जानो…”
विवेक की पलकों में एक आँसू आकर अटक गया। “मैं… मैं तुम्हें सुन सकता हूँ, अनामिका। मैं… मैं यहाँ हूँ।”
तृषा ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ इतनी ठंडी थीं जैसे दीवारों की नमी उनमें उतर आई हो। “विवेक… ये सच… ये सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है। ये हमारा भी हिस्सा बन गया है।”
वो पल—जिसमें हवेली, अनामिका, और उनका अपना डर—सब एक धड़कती हुई लय बन गए। और अन्तिम द्वार—अब वो सिर्फ़ एक लकड़ी का दरवाज़ा नहीं, उनके अतीत और आत्मा का मिलन बिंदु था।
अन्तिम द्वार के सामने, मोमबत्ती की काँपती लौ ने दीवारों की सीलन और उभरे हुए शब्दों को एक जीवित कविता में बदल दिया। हर लकीर, हर दरार जैसे साँसें ले रही थीं।
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से और कसकर भींच लिया। उसकी आँखों में एक नई चमक थी—भय और यक़ीन के बीच एक धधकता हुआ संतुलन।
“तृषा,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। “ये दस्तावेज़… ये हवेली… ये सिर्फ़ कहानी नहीं। ये… ये हमारे खून का हिस्सा है। और इस खून की कसम… अब हम दोनों पर है।”
तृषा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे—डर और प्यार की खामोश लहर। “कसम? कैसी कसम, विवेक?”
विवेक ने दस्तावेज़ के एक पन्ने को खोला। वहाँ टूटी हुई स्याही में एक शब्द उभरता था—“रक्त”। जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे लिखा हो—एक चेतावनी, या कोई शपथ।
“ये शब्द… ये मेरे खून की कसम माँग रहे हैं, तृषा,” विवेक की आवाज़ में एक थकी हुई दृढ़ता थी। “अगर ये हवेली मेरे खून की विरासत है, तो मुझे भी इसमें अपना हिस्सा देना होगा। और अनामिका… वो भी इसी विरासत की आत्मा है।”
तृषा ने काँपते स्वर में कहा, “विवेक… ये सब… ये कितना खतरनाक है। अगर तुमने इस हवेली से कोई कसम ली, तो… तो तुम कहीं खो जाओगे।”
विवेक ने उसकी हथेली को अपनी हथेली में लिया। “मैं खोना नहीं चाहता, तृषा। लेकिन मैं जानता हूँ—ये कहानी तब तक पूरी नहीं होगी जब तक मैं अपना खून इसमें नहीं बहा दूँ… जब तक मैं अपने भीतर इस हवेली की चीख़ को नहीं सुनता।”
उसके शब्द हवा में ठहरे हुए थे—जैसे कमरे की नमी भी उन्हें पी रही हो। दीवारों पर उकेरे हुए श्लोक अब धीरे-धीरे स्याही में बदल रहे थे—उन शब्दों से जो दस्तावेज़ के पन्नों पर थे।
“रक्त की प्रतिज्ञा… आत्मा की क़ैद…”
विवेक ने धीरे-धीरे अपनी उँगली पर एक छोटी सी खरोंच बना ली। खून की एक बूँद उसके पोरों से निकली—गहरी, लाल, और ज़िंदा।
तृषा ने घबराकर उसका हाथ थाम लिया। “विवेक! क्या कर रहे हो?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
विवेक की आँखों में एक स्थिर शांति थी। “ये खून… ये सिर्फ़ एक बूँद नहीं, तृषा। ये… इस हवेली के लिए मेरी प्रतिज्ञा है। ये दस्तावेज़… ये दीवारें… सब गवाह हैं कि मैं भाग नहीं रहा।”
उसने अपनी खून की बूँद को दस्तावेज़ के एक कोने पर टपकाया। पन्ने की पुरानी, भूरे रंग की सतह पर खून की बूँद फैली—जैसे किसी भूले हुए चित्र में एक नया रंग उभर आया हो।
एक पल के लिए कमरे की हवा भारी हो गई। दीवारों से आती फुसफुसाहटें थम गईं—जैसे हवेली ने उस कसम को स्वीकार कर लिया हो।
तृषा की आँखों में आँसू थे। उसने धीरे से विवेक की कलाई थाम ली। “अगर ये तेरी कसम है, विवेक… तो मैं भी तेरा हिस्सा हूँ। मैं भी… इस कहानी की क़ैद में तेरे साथ हूँ।”
उसकी आवाज़ में एक ऐसी कसम थी, जो शब्दों से नहीं, दिल की धड़कनों से निकल रही थी।
वो पल—जिसमें खून की बूँद और आत्मा की कसम एक हो गए। और हवेली की हर दीवार ने ये कहानी सुन ली—एक नई शुरुआत, एक नई क़ैद।
विवेक की खून की बूँद दस्तावेज़ पर धीरे-धीरे फैल रही थी। लाल रंग—जैसे हवेली के दिल की धड़कन बन गया हो। मोमबत्ती की काँपती लौ ने उस रक्त की चमक को और भी भयावह बना दिया।
तृषा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे—लेकिन उसकी उँगलियाँ विवेक की कलाई पर कसकर जमी हुई थीं। जैसे वो जानती थी—ये सिर्फ़ एक बूँद नहीं, एक नई कहानी की शुरुआत थी।
अन्तिम द्वार ने एक धीमी—मगर गहरी—कराहती हुई आवाज़ दी। दरवाज़े के पार से एक सर्द हवा का झोंका उनके चेहरों को छू गया—एक साँस, जो ज़िंदा थी।
“तुम्हें अब सच जानना होगा…”
विवेक ने फुसफुसाहट को सुना। उसकी आँखें बन्द हो गईं—उसके भीतर जैसे कोई छाया जाग गई हो। उसकी उँगलियों में दस्तावेज़ काँपने लगा—हर शब्द जैसे उसकी नसों में उतरता जा रहा था।
तृषा ने धीमी आवाज़ में कहा, “विवेक… ये दरवाज़ा… ये हमें खींच रहा है।” उसकी आवाज़ में डर था—लेकिन साथ ही एक अदम्य आकर्षण भी।
विवेक ने उसकी ओर देखा। “ये अन्तिम द्वार है, तृषा। इसके पार… अनामिका की आत्मा है। और शायद… दादाजी का सच भी।”
उसने दस्तावेज़ को दरवाज़े पर टिकाया। मोमबत्ती की लौ की रोशनी में दस्तावेज़ के पन्नों पर छवियाँ तैरने लगीं—अनामिका का चेहरा, उसकी आँखों में डूबा दर्द।
फिर—वो दृश्य फूट पड़ा।
विवेक ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। एक अँधेरा, फिर उजाला—और एक धुँधला गलियारा। वहाँ अनामिका खड़ी थी—सफ़ेद साड़ी, बिखरे बाल, और आँखों में असीम वेदना।
उसने विवेक की ओर देखा। “तुम… तुम वही हो, जो मुझे देख सकता है,” उसकी आवाज़ धीमी थी, मानो हवेली की हर ईंट उसकी भाषा बोल रही हो।
तृषा ने भी उस दृश्य को देखा। उसकी आँखों में आँसू बहने लगे। “वो… वो सच में यहीं है, विवेक…” उसकी फुसफुसाहट काँप रही थी।
अनामिका की परछाईं आगे बढ़ी। “ये हवेली… ये मेरी क़ैद है। और तुम्हारा खून—ये चाबी है, जो इस क़ैद को तोड़ सकती है।”
विवेक ने दस्तावेज़ की जिल्द पर उँगलियाँ कस लीं। “क्यों? क्यों दादाजी ने तुम्हें यहाँ बाँध दिया?” उसकी आवाज़ में दर्द और गुस्सा घुल गए थे।
अनामिका की आँखें एक पल के लिए बन्द हो गईं। “क्योंकि उन्होंने मुझसे प्यार किया… और फिर मुझे इस हवेली में क़ैद कर दिया। उनका प्यार… एक श्राप बन गया।”
तृषा की साँसें तेज़ थीं। “ये सच है… तो हम क्या कर सकते हैं?” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
अनामिका ने अपनी आँखें खोलीं। “मेरी आत्मा… इस अन्तिम द्वार के पार क़ैद है। अगर तुम सच में मुझे मुक्त करना चाहते हो—तो तुम्हें इस दरवाज़े के पार जाना होगा। वहाँ… वो सच छुपा है, जो तुम्हारे खून में लिखा गया है।”
विवेक ने गहरी साँस ली। “मैं जाऊँगा। क्योंकि अब ये सिर्फ़ तुम्हारी कहानी नहीं, अनामिका—ये मेरी कहानी भी है।”
उसने अन्तिम द्वार के हैंडल को पकड़ा। दरवाज़े की लकड़ी सर्द थी—जैसे उसमें सदियों की उदासी क़ैद थी।
तृषा ने उसका हाथ थामा। “साथ… हर क़दम पर,” उसने बहुत धीमे कहा। उसकी आवाज़ में डर था—पर उससे बड़ा विश्वास।
अन्तिम द्वार ने एक गहरी कराहती साँस छोड़ी। दरारों से जैसे अनामिका की आवाज़ फूट पड़ी—“अब सच को देखने के लिए तैयार हो जाओ…”
विवेक ने अपनी आँखें खोलीं। उसके भीतर अब डर नहीं था—बस एक जिद थी। “हाँ, अनामिका। हम तुम्हें तुम्हारी क़ैद से मुक्त करेंगे—चाहे इसके लिए हमें इस हवेली की आत्मा में उतरना पड़े।”
दरवाज़ा बहुत धीरे-धीरे चर्र…चर्र…करता हुआ खुलने लगा। अँधेरे की ठंडी साँसें कमरे में भरने लगीं—और उनके सामने वो रास्ता खुल रहा था, जहाँ हर डर, हर सवाल और हर उत्तर छुपा था।
अन्तिम द्वार की लकड़ी चर्र…चर्र…करती हुई खुली, और जैसे ही वो पूरा खुला, एक सर्द, घुटन भरी हवा उनके चेहरे पर आकर लगी। हवा में एक ऐसी नमी थी—जैसे सदियों पुराने आँसुओं की गंध।
विवेक ने गहरी साँस ली। उसके भीतर एक कंपन दौड़ गई—पर अब वो वापस नहीं जाना चाहता था। तृषा का हाथ उसने अपनी मुट्ठी में कसकर थामा। “साथ… हर क़दम पर,” उसने फुसफुसाया।
तृषा की आँखों में डर और दृढ़ता एक साथ झिलमिला उठे। “साथ…” उसकी फुसफुसाहट एक वादा थी—उस डरावनी, ठंडी हवा के बीच एक गरम साँस।
वो दोनों बहुत धीमे-धीमे उस अँधेरे में उतरने लगे। मोमबत्ती की लौ अब भी काँप रही थी, जैसे हर छाया से डर रही हो। हर क़दम पर फर्श पर जमी नमी और काई की गंध उनकी साँसों में भर रही थी।
अन्दर… कमरे की दीवारों पर कुछ नहीं था—कोई चित्र नहीं, कोई दरार नहीं। सिर्फ़ एक ठंडी, सीलन भरी सादगी। पर उस ख़ामोशी में एक अजीब सी उपस्थिति थी—जैसे कोई अदृश्य आत्मा उनके हर क़दम को देख रही हो।
फिर—एक धीमी, कराहती हुई फुसफुसाहट। “तुम… आ गए हो…”
विवेक ने दस्तावेज़ को अपने सीने से और कस लिया। उसकी उँगलियाँ स्याही की उन लकीरों में जैसे अनामिका की साँसों को महसूस कर रही थीं। “हाँ,” उसने धीरे से कहा। “हम आ गए हैं… तुम्हारे पास।”
कमरे के बीचोंबीच एक छोटी-सी जगह थी—जैसे किसी ने सदियों पहले वहाँ पर कुछ गाड़ दिया हो। फ़र्श पर जमी काई को हटाने पर एक गोल निशान दिखा—किसी पुराने अनुष्ठान का चिह्न।
तृषा की आवाज़ काँप रही थी। “ये… ये सब… ये सच में हुआ था, विवेक? अनामिका… और तुम्हारे दादाजी?”
विवेक ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में अजीब सी शांति थी—जैसे वो अब किसी और दुनिया में खड़ा हो। “हाँ, तृषा। ये सब हुआ था। और अब… ये सब मेरे भीतर भी हो रहा है।”
उसने दस्तावेज़ को उस गोल निशान के बीच रख दिया। मोमबत्ती की लौ में दस्तावेज़ की स्याही और गहरी हो गई—जैसे वो हर शब्द में और जिंदा हो रही हो।
फिर—दीवार से एक परछाईं धीरे-धीरे बाहर निकली। वो धुँधली थी—सिर्फ़ एक धुंधला चेहरा, और उसमें दो गहरी, भीगी आँखें।
“अनामिका…” तृषा की आवाज़ डूबती हुई सी थी।
विवेक ने धीमे से अपना हाथ बढ़ाया। “तुम्हें मुक्त करना है… तुम्हारी आत्मा को इस क़ैद से आज़ाद करना है,” उसने फुसफुसाया।
पर अनामिका की परछाईं ने सिर हिला दिया। “मुक्ति… सिर्फ़ तब मिलेगी जब ये रक्त… और ये आत्मा… एक हो जाएँगे।”
विवेक की आँखों में आँसू आ गए। “कैसे?” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
अनामिका की परछाईं और पास आई। “तुम्हारा खून… मेरी आत्मा… ये हवेली… तीनों को एक बनाना होगा। तभी इस क़ैद का अन्त होगा।”
तृषा ने डर से उसकी बाँह थाम ली। “विवेक… इसका मतलब क्या है?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
विवेक ने बहुत धीरे कहा, “इसका मतलब… मैं अब सिर्फ़ ‘मैं’ नहीं रहूँगा, तृषा। ये हवेली… और अनामिका… मेरी हर साँस में उतर जाएँगे।”
अनामिका की आँखें एक पल के लिए चमक उठीं। “हाँ,” उसकी फुसफुसाहट आई। “और तभी… मैं हमेशा के लिए मुक्त हो जाऊँगी।”
उसने अपना हाथ विवेक की ओर बढ़ाया—एक पारदर्शी, ठंडा हाथ। विवेक ने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया। जैसे ही दोनों की उँगलियाँ मिलीं, एक सर्द लहर उसके पूरे जिस्म में दौड़ गई।
उस पल—कमरे की हर दीवार, हर ईंट, हर साँस जैसे थम गई। दस्तावेज़ की स्याही से एक धीमी रोशनी निकली—और तीनों के चारों ओर फैल गई।
विवेक ने आँखें बन्द कर लीं। “सिर्फ़ एक पल, अनामिका… और फिर सब आज़ाद हो जाएँगे।”
उस पल, हवेली की दीवारों से एक लोरी सी आवाज़ फूट पड़ी—धीमी, उदास… और खूबसूरत। जैसे सदियों पुरानी मोहब्बत की एक आख़िरी धुन।
तृषा की उँगलियाँ विवेक की उँगलियों में उलझी थीं। उसकी फुसफुसाहट एक आख़िरी वादा थी। “साथ… हर जगह… चाहे ये अंधेरा ही क्यों न हो।”
वो पल—जिसमें आत्मा, खून और हवेली—एक साथ धड़क उठे। और अनामिका का चेहरा आख़िरी बार मुस्कराया—जैसे उसने उस अँधेरे में भी एक प्रेम गीत सुन लिया हो।
अन्तिम द्वार के पार, हवेली ने अपनी साँसें छोड़ दी थीं। कमरे की हवा एक जिंदा चीख़ बन गई थी—हर दीवार, हर ईंट जैसे किसी गुप्त धड़कन से काँप रही थी।
विवेक की आँखें बन्द थीं—उसके भीतर अनामिका की परछाईं धीरे-धीरे उसके खून में समा रही थी। एक अजीब, सर्द लहर ने उसकी हर सोच को छू लिया।
तृषा की उँगलियाँ उसके हाथ पर कस गईं। उसकी साँसें भी अब उसी लय में थीं—हवेली की साँसों के साथ। “विवेक…” उसकी आवाज़ धीमी, काँपती हुई थी।
विवेक ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। अनामिका की परछाईं उसके सामने थी—लेकिन अब वो परछाईं नहीं, एक जिंदा आँखें बन गई थी। उसमें एक शांति थी—जैसे सदियों से बन्द दरवाज़े ने अब खुद को खोल दिया हो।
“तुम… तुमने मुझे देख लिया,” अनामिका की आवाज़ धीमी थी—लेकिन उसमें एक थकी हुई मुस्कान थी। “अब मैं… मैं आज़ाद हूँ…”
विवेक ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया। “हाँ… अब तुम आज़ाद हो…” उसकी आवाज़ एक आख़िरी, काँपती हुई फुसफुसाहट थी।
अनामिका की छवि हल्की हुई—जैसे धुएँ की तरह बिखर रही हो। कमरे में दीवारों से एक सर्द हवा उठी—और फिर वो परछाईं गायब हो गई।
तृषा की आँखों में आँसू थे। “वो… चली गई?” उसकी आवाज़ में एक नमी थी—एक आख़िरी विदा।
विवेक ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। “हाँ… पर वो यहीं है, तृषा। इन दीवारों में, इन दरारों में। अब वो हवेली की साँस बन गई है।”
कमरे में अजीब सी शांति उतर आई। दीवारों पर उकेरे हुए शब्द अब धुँधले हो गए थे—जैसे अपनी कहानी पूरी करके सो गए हों। दस्तावेज़ का आख़िरी पन्ना मोमबत्ती की लौ में काँपता रहा—फिर धीरे-धीरे थम गया।
तृषा ने विवेक का हाथ थाम लिया। उसकी उँगलियों में अब डर नहीं था—सिर्फ़ एक गर्माहट थी। “विवेक… ये सब अब तुम्हारा अतीत नहीं… ये तुम्हारा सच है। और अब… हम इस हवेली के हिस्से नहीं… हवेली अब हमारे हिस्से की बन गई है।”
विवेक ने गहरी साँस ली। उसकी नज़रें दीवार की दरारों पर थीं—जैसे हर लकीर में उसे अपनी ही परछाईं दिख रही हो।
फिर उसने बहुत धीरे कहा—“अब ये हवेली… हमारी साँसों में धड़कती रहेगी। हर फुसफुसाहट में, हर अँधेरे में… ये कहानी कभी खत्म नहीं होगी।”
तृषा ने उसकी ओर देखा। “तो… ये हमारी कहानी भी है, विवेक?”
विवेक ने उसकी आँखों में देखा। “हाँ, तृषा। ये हवेली… अब हमारी भी साँसें ले रही है।”
मोमबत्ती की लौ बहुत धीरे-धीरे बुझ गई। कमरे में अँधेरा गहराया—लेकिन उस अँधेरे में कोई डर नहीं था। बस एक धीमी, अनंत धड़कन थी—हवेली की साँसें… और उनका अपना दिल।
🌿 लेखक की कलम से
यह कथा केवल हवेली की नहीं है — यह मेरे अपने शब्दों की भी यात्रा है।
हर दरार में छुपी हुई कहानियाँ मेरी कलम की स्याही में घुल गईं।
हर परछाईं, हर फुसफुसाहट — मैं बस उन्हें अपने शब्दों का दीपक दे सका।
मैंने इन ईंटों से झाँकते अतीत को सुना, और उसे तुम्हारे सामने सजीव किया।
कभी-कभी लगा, ये हवेली मेरी नहीं — मैं ही इसका हिस्सा बन गया हूँ।
शब्द मेरे थे, पर उनकी आत्मा हवेली की थी।
– Lucifer Singh


